आज भी अमेरिका रंगभेद और नस्लभेद से दूर कहाँ है?

बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ जब अमेरिका से ज्यादा भारत के लोग अमेरिकी सरकार को लेकर खुश थे| भारत में लोग अमेरिका के सत्ता परिवर्तन को लेकर इतने खुश थे कि ढोल नगाड़े से लेकर मिठाइयाँ तक बाँट कर खुशियाँ जाहिर की थी| अभी कुछ दिन पहले ही एक भारतीय इंजिनियर श्रीनिवास को वहाँ मार दिया जाता है| यह मामला अभी ठंडा भी नहीं होता है कि दुसरे भारतीय हर्निश पटेल को मौत की नींद सुला दिया जाता है| उसके बाद फिर एक भारतीय सिख पर रंगभेद हमला होता है| ये सारी घटनाएं 2017 की ही है| ऐसा नहीं है कि ये कोई नई चीज है| ऐसा कोई साल बाकी नहीं रहा है जब कोई भारतीय नहीं मरता हो|

इस बार ख़ास इसलिए है क्युकी भारतीय लोगों में उसी डोनाल्ड ट्रम्प को लेकर बहुत ज्यादा उत्साह दिखा था| इससे पहले मैंने अपने पिछले एक आर्टिकल में ये लिखा था कि डोनाल्ड ट्रम्प का मुसलमानों की प्रति असहिष्णुता देखकर भारतीय गैर मुसलमानों को खुश होने की जरूरत नहीं है क्युकी आने वाले कल में उनकी बारी भी आ सकती है| सच्चाई तो यह है की अमेरिका हिन्दुओं के प्रति भी अमेरिका असहिष्णु तो थी ही, लेकिन उस तरह से ओपन नहीं हो रही थी है जैसे मुस्लिमों के लिए हुई थी| अब धीरे धीरे सामने असली चेहरा आ रहा है|

हमें ऐसी चीजें इतिहास से भी सीखना चाहिए| क्युकी कई बार इतिहास दोहराई जाती है| जब पुर्तगाली भारत आए थे तब वो भी मुस्लिमों के प्रति बहुत असहिष्णु थे और हिन्दुओं के प्रति काफी टोल्रेंट रहते थे| वो चीजें हिन्दुओं को अच्छी लगती थी| लेकिन समय बदला और उनकी व्यावहारिकता बदली और हिन्दुओं के लिए भी असहिष्णु हो गए| बातें बहुत बाद में समझ आई जब तक बहुत देर हो चुकी थी| उससे जो समस्या औपनिवेशवाद पैदा हुई उसे हराने और भारत से भगाने में दो सौ साल लग गए|

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साम्राज्यवाद के समय में ब्रिटेन और फ्रांस दोनों ने अलग अलग मुल्कों के नब्ज पकड़ा हुआ था कि किससे कैसे निपटना है| जैसे फ्रांस अरब देशों में अपनी हुकूमत कायम करने के लिए शिया सुन्नी का सेक्टोरिअल नब्ज पकड़ा हुआ था| ठीक वैसे ही जैसे भारत में हिन्दू-मुस्लिम का नब्ज अंग्रेजों ने पकड़ा हुआ था| इसलिए जो चीजें दिखती है वो जरूरी नहीं है कि पुर्णतः सही ही हो| अमेरिकी चुनाव को देखकर भारतीय गैर मुस्लिम लोगों को उनमे हितैषी नजर आया लेकिन उसका असली चेहरा हम सब के सामने है|

सच्चाई तो यह है कि हम सब अमेरिका की असली नीति से कोसो दूर है| अमेरिका शब्द सुनने के बाद बेशक हमारे जेहन में वर्ल्ड लीडर और लोकतान्त्रिक देश की इमेज आती हो लेकिन इस सच को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि अमेरिका एक क्रिस्चियन देश है और अपने धर्म के प्रति अपने देश के लोगो के लिए जवाबदेही रहती है| चाहे वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा बने या फिर डोनाल्ड ट्रम्प या फिर हिलेरी क्लिंटन, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता| सिर्फ चेहरे बदलते है|

इस बात को मजबूत करने के लिए प्रेसिडेंसीयल डिबेट की एक वाकया ही काफी है| जिसमे एक श्रोता डोनाल्ड ट्रम्प से पूछता है कि आपके आपके आने के बाद क्या मुसलमानों की वीजा पर दोबारा चिंतन होगा| इसपर डोनाल्ड ट्रम्प ने बड़े ही बेबाकी से जवाब दिया था कि “बिल्कुल होगी| मै क्या अगर हिलेरी आएंगी तो भी वही करेंगी| बस अंतर मात्र इतना है कि वो कह नहीं रही है सामने और मै सामने कह रहा हु|” हमारे देश का एक तबका उनकी जीत की ख़ुशी यह सोचकर मना रहा होगा कि वो मुस्लिम विरोधी है, इसलिए वो हमारे नजदीकी हो सकते है| जबकी ऐसी सोच रखना मृगतृष्णा के समान है|

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सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि अमेरिका जैसे देशों में जिसे वर्ल्ड लीडर के रूप में देखा जाता है वो आज भी रंगभेद और नस्लभेद जैसी बीमारियों से पीड़ित है| इसके खिलाफ लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग को युवा अवस्था (1929-1968) में ही मार दिया जाता है| ठीक वैसे ही जैसे भारत में महात्मा गाँधी को मार दिया जाता है| भारत की एक्सट्रीमीटिज हो, मिडिल ईस्ट के एक्सट्रीमीटिज हो या अमेरिका के एक्सट्रीमीटिज हो, इन सब में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है|

अमेरिका में पहले ऐसे नस्ल भेद के लिए बाकायदा कनूनें भी थी जिसे “जिम क्रो लॉ” कहा जाता था| ऐसे क्षेत्र भी बनाए गए थे जहाँ नस्ल भेद चरम पर थी और खुलेआम अंजाम देती थी उस क्षेत्र को “डिक्सी” कहा जाता था| इन्ही सब के खिलाफ उस छोटी उम्र में मार्टिन लूथर किंग लड़ा करते थे| ब्लैक प्रेसिडेंट के रूप में बराक ओबामा के बनने के बाद लोगों को और विश्लेषकों को ऐसा लगा था कि अमेरिका एक नए अध्याय की और बढ़ रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी रंग भेद और नस्लभेद की बीमारी से अमेरिका अछूता नहीं है|

डोनाल्ड ट्रम्प अपने शासन के शुभारम्भ वाले भाषण में कहते है ““When you open your heart to patriotism, there is no room for prejudice.” लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका में देशभक्ति के कमी ही रंगभेदी और जातिवादी का जड़ है? नहीं| इस कांसेप्ट की देखभाल हर युग के तेज और चालाक अमेरिकन द्वारा ही की जाती है| भारत के छोटी छोटी घटनाओं को बहुत बड़े दंगों के रूप में देखा जाता है और अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित किया जाता है|

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लेकिन अगर हम अमेरिका के घर में झाकेंगे तो पाएंगे कि अमेरिका का इतिहास ही नस्लवादी दंगो और हिंसाओं से भरा हुआ है| उसी श्रृंखला में भारतीय प्रवासियों पर भी निरंतर हमले होते रहे है| अभी जो लगातार हमले हुए उसपर जिस तरह की चर्चाएँ होनी चाहिए थी वो नहीं हो रही है| हमारे देश के लोगों और मीडिया का पूरा ध्यान उत्तरप्रदेश चुनाव और डीयु में हो रहे उथल पुथल तक ही सिमित है| हो सकता है इसमें कोई राजनितिक फायदा नहीं है इसलिए सुर्खी नहीं बन पा रही है| नहीं तो ये मामला उत्तरप्रदेश की अखलाक वाली घटना से कम थोड़े ही है|

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