बाजारवाद के भंवर में फसाए जा रहे मजदूर उपभोक्ता

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बहुत सी चीजों का ज्ञान जीवन के एक्सपीरियंस से मिलता है| अभी फिलहाल मै फरीदाबाद के एक कंपनी में इंटर्नशिप कर रहा हूँ| यहाँ मै जब मजदूरों(कुशल और अकुशल) को काम करते देखता हूँ तो बहुत साड़ी बातें मन में उभर कर आती है| एक ही जगह पर खड़े होकर एक ही काम प्रतिदिन 8 से 10 घंटे करना कितना उबाऊ लगता होगा न| इन मजदूरों की तनख्वाह की लिस्ट बाहर लगी होती है| प्रतिदिन 350 से 400 रूपए के रेंज में पैसे इन्हें मिलते है| अगर इनकी तनख्वाह देखी जाए तो अमूमन ज्यादा से ज्यादा जो कुशल मजदूर होगा उसे बारह हजार के आस पास मिलनी चाहिए|

इसमें से भी कुछ ऐसे मजदूर होते है जो किसी ख़ास समूह से बोंडेड होते है| मै ऐसे कुछ लोगों को भी जनता हूँ जो ऐसे बोंडेड लेबर सप्लाई करने का काम करते है| उन मजदूरों को वो महज पाच हजार देते है| कभी कभी वो भी देते नहीं है| बाकी का लगभग सात हजार एकोमोडेशन के नाम पर रखते है| पहला निष्कर्ष तो यह निकाला कि ये ठेकेदार कितने हराम के खाने वाले होते है जो दिन-दिन भर कर खड़े होने वाले लोगों की कमाई घर बैठे खाते है| ऐसे काम को वो लोग बिसनेस कहते है| मजदूर बेचारा लूटता नजर आता है|

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दुसरे निष्कर्ष के तरफ मै तब जाता हूँ जब मै उनके हाथों में एंड्राइड मोबाइल फोन देखता हूँ| फिर दोबारा मुझे एहसास होता है कि बेचारे फिर ठगे गए| इन मोबाइल से उन्हें लगता होगा कि वो विकास कर रहे है जबकी यह सत्य नहीं है| बाजारवाद की इस दुनियां में अगर आप नोट करेंगे तो पाएंगे कि जितने फोन की इंडस्ट्री इस देश में नहीं है उससे ज्यादा उसके सर्विस सेंटर है| इसके पीछे कारण यह दिया जाता है कि अपने ग्राहकों की सुविधा के लिए खोली जाती है| यही तो दुर्भाग्य है इस देश का सब बिमारी का इलाज करने के लिए सैकड़ों अस्पताल खोलते है लेकिन उन्हें बीमारी से बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं करते|

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यही सच्चाई कंपनियों की भी है कि मोबाइल कंपनियां जानबूझकर ऐसे खाने अपने ग्राहकों को परोसते है जिससे वो बीमार हो और सर्विस सेंटर जाए| आप ध्यान देने किसी भी सर्विस सेंटर में रिपेयरिंग नहीं होता बल्कि पार्ट्स बदला जाता है| पार्ट्स के दाम इतने महंगे होते है कि ग्राहक को एहसास होता है कि इससे अच्छा थोडा और जोड़ के नया ही फोन लेले| हर क्षेत्र में कंपनियों का वही हाल है|

कहने का मतलब यह कि कंपनियां एक जेब में 10 रूपए देकर दुसरे जेब से 30 रूपए निकालने के चक्कर में रहती है| इसकी का परिणाम है कि उनकी हालात जस का तस रह जाता है बदलती है तो बस उनकी पीढ़िया| और दूसरी ओर उद्योगपति दिन दुगनी रात चौगनी लूटते चले जाते है किसी को पता भी नहीं चलता| ऐसा इसलिए होता है क्युकी हम भूल जाते है कि एंटीवायरस वही कंपनियां बनाती है जो वायरस बनाती है| हमें लगता है कि वायरस एक महामारी वाली बीमारी है जो हमारे लैपटॉप को खा जाएगा|

पहले वो खुद बिमारी देते है फिर उनके इलाज के लिए सालाना पैकेज ऑफर करके अपने ग्राहकों को अपने सिस्टम को वायरस फ्री रखने का सलाह देते है| उपभोक्ता बेचारा फिर उल्लू बनता नजर आता है| आज जब मोबाइल से सारा काम नहीं होता है तो लोग एक बार ठोकर खाने के बाद वापस हजार-दो हाजर रूपए वाले साधारण फोन लेकर अपना काम चला लेते है| जब सब कुछ मोबाइल पर निर्भर होना शुरू हो जाएगा तो उन मजदूरों को जबरजस्ती बीमारी वाला फोन खरीदकर रोना होगा और खुद दिन भर खड़े होकर कमाने वाले धन कंपनियों के मालिकों के जेब में भरने होंगे|

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