विवेक और क्षमताओं पर भावनाएं हावी

पिछले कुछ महीनों दुनिया में तीन शब्दों का एक पंक्ति “पोस्ट ट्रुथ एरा” बहुत ही मशहूर रहा था| इसका मतलब होता है कि सत्य के बाद का युग जिसमे हम जी रहे है| उदारवादी लोगों का मानना था कि इस युग में विवेक और क्षमताओं पर भावनाएं हावी हो रहा है| पिछले आर्टिकल में इन्ही तीन शब्दों को केंद्र में रखकर वैश्विक स्तर पर सोचने की कोशिश की थी| लेकिन यह भारतीय परिपेक्ष में यह बहुत हद तक सत्य है| आज का हमारा युवा पीढ़ी सत्य से संवाद करने में बहुत हिचकिचाता है| उसे पढने के लिए नूडल टाइप मटेरियल चाहिए|

पूरी चीजें पढने का समय नहीं है| बहुत सारी चीजें (हैंगओवर, पार्टी, लैपटॉप, ट्रैकिंग, खेल, पिकनिक, गर्लफ्रेंड आदि) है सबको साथ रखकर चलने की कसौटी में बहुत कुछ आधा-अधुरा छोड़ जाता है| निसंदेह वो चीजें भी बहुत जरूरी है लेकिन किसी भी कीमत पर नहीं| धर्य भी निरंतर कम होता जा रहा है| जो कुछ भी आधा-अधुरा पाता है उसे सत्य मानकर अपनी प्रक्रिया देता है| कभी अपनी गलतियाँ स्वीकार्य नहीं करना चाहता है| अगर किसी से संवाद करता है तो पहले निर्णय निकालता है फिर चर्चा करता है| जबकी होना इसके ठीक उल्टा चाहिए था|

यही कारण है कि जाने अनजाने विवेक से अपनी दुरी बनाए रखता है| जबकी उसे ऐसे प्रतीत होता है कि वो विवेक के बिल्कुल सामने बैठा है| यह मृगतृष्णा का जीता जागता उदहारण है| गलती उसकी बिल्कुल नहीं है| उसे अभी भी यही पता है कि वो करीब है लेकिन वास्तविकता में है नहीं| इसी कमोबेश में अपनी क्षमता का पूरा-पूरा उपयोग करने में असमर्थ रहता है| यही मुख्य कारण है कि उसका विवेक और क्षमताओं के ऊपर भावनाएं हावी होती चली जा रही है और मासूम सा बच्चा इस बात से बहुत ही परे है|

उदारवादी लोगों ने कुछ भी गलत नहीं कहा था| ये सच में “पोस्ट ट्रुथ एरा” है जहाँ विवेक और क्षमताओं पर भावनाएं हावी हो रही है| इस पर दुनिया के तमाम दक्षिणपंथी समूहों ने इसका मजाक जरूर उड़ाया था, लेकिन आज देश और विश्व का वातावरण देखने के बाद उदारवादी समूह के लोगों की बातों में मुझे सत्य का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है| अगर ऐसा नहीं होता तो शायद इरोम शर्मीला जैसी धर्यवान और सशक्त महिला को भारत के लोग भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था से रिजेक्ट नहीं करते|

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हम लोगों की सबसे बड़ी खामी यही है कि हम बाहर देख घर के भीतर अनुसरण करने की चाहत रखते है| ऐसा पूर्वजों में भी था और हमारे अन्दर भी है| हमने कभी अपनी पहचान बनाने की कोशिश नहीं की| भारत की एकता और विश्व के अन्य देशों की एकता में बहुत अंतर है जिसे हम आज तक समझ पाने में असमर्थ है| भारत की एकता ऐसी है जो खान-पान, पढ़वा-ओढावा, बोल-चाल, जाती-धर्म पर बिल्कुल निर्भर नहीं करती है|

भारत की एकता सिनेमा थिएटर में राष्ट्रगान गाने और न गाने वाली भावना पर भी निर्भर नहीं करता है| भारत की एकता मांसाहारी और शाकाहारी स्वाद से बहुत कोसो दूरी बनाए हुए है| जबकी हम पश्चिमी देशों की ओर झांकते है और वहाँ की चीजों का अनुसरण कर एकता और पहचान बनाने की कोशीश करते है जिसमे हमेशा असफल रहते है| यही असफलताएँ भावनाओं में कब-कब में तब्दील हो जाती है हमें पता भी नहीं चलता और विवेक कोसों दूर छुटता चला जाता है|

ठीक ऐसे ही आज तक मुस्लिम समाज में मौलवियों ने और हमने भारतीय मुस्लिम की अपनी ‘भारतीय मुस्लिम’ वाली पहचान स्थापित नहीं करने दिया| इस समाज पर कुछ चुनिंदे मौलवियों का कब्ज़ा है, जो हमेशा पश्चिमी एशियाई देशों के घरों में अपनी पहचान को ढूंढते रहते है| देश में कुछ मौलवी ऐसे भी है जो युवा लड़के लड़कियों को अरबी सिखने पर बल है ताकी अपने धार्मिक चीजों को अरबी पहचान में ही उसका एहसास कर सके| सामने वाले युवा लड़के या लड़की से उसका विचार जानने की कोशीश भी नहीं करते कि वो ऐसे में कम्फ़र्टेबल है कि नहीं?

हमारे देश में जो भी गैर मुस्लिम है वो भारत के मुसलमानों को अपनी भारतीय मुस्लिम वाली पहचान बनाने से हमेशा रोकता है| सिरिया और इराक में अगर कोई घटना घटित होती है तो भारत के मुसलमानों को भी उसी चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है| मानों इनके सगे संबंधी वहाँ वो सब कर रहे है| फिर सिरिया में हो रहे गन्दी करतूतों की जवाबदेही भारतीय मुसलमानों पर तय करने की कोशिश की जाती है| ऐसा इसलिए कि भावनाओं ने हमें गुलाम बना रखा है|

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यही नहीं अपने पडोसी मुल्क म्यांमार को देखा जाए तो पता चलता है कि वो तो पूरी तरह से भावनाओं में बह चुके है| उनके पास तर्क, विवेक का कोई जगह ही नही है| बौध धर्म को शांति प्रिय धर्म माना जाता है जिसमे निर्वाण पर बल दिया जाता है| भारत में ब्राम्हणों और बौध में इसी विचार पर टकराव हुआ करती थी| बौध धर्म के अहिंसक कांसेप्ट से भारत के ब्राम्हण इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने भी शाकाहार पर बल देना शुरू कर दिया था|

वही बौधिस्ट आज हिंसा का सहारा ले रहे है जिन्हें अहिंसा का प्रतिक माना जाता था| वहाँ के लोग रोहिंग्या मुस्लिम अपने यहाँ से भगा रहे है उन्हें आज भी नागरिकता का अधिकार नहीं दिया हुआ है| चुकी उन लोगों का मानना है कि मुसलमानों को म्यांमार में अंग्रेज लेकर आए थे और जब अंग्रेज चले गये तो इन्हें भी चला जाना चाहिए| जिस विवेक के लिए बौध धर्म का प्रचार प्रसार विश्व में परिपक्व स्तर पर रहा था उसी धर्म के लोगों के विवेक के ऊपर भावना काबिज हो रहा है और धर्य निरंतर कम होता चला जा रहा है|

हमारे देश का युवा अपने विकास का सबसे बड़ा पैमाना जीडीपी और ग्रोथ रेट को रखता है| वो विश्व में झांकता है| बिना समझे और अपने विवेक का उपयोग किए वो इस निष्कर्ष पर पहुच जाता है कि हमें विकसित बनने के लिए देश को एक रंग में रंगना ही पड़ेगा| उसे सबसे पहले चाइना दिखाई पड़ता है और सवालें हिलोरे मारने लगती है कि आखिर उसका डाटा हमसे ज्यादा कैसे है? प्रतिद्वंद में आने लगता है और उसे वो लोग उसे असामाजिक तत्व दिखाई देने लगते है जो तार्किक रूप से किसी मुद्दे पर अपनी असहमति व्यक्त करते है|

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फिर तुरंत देशद्रोही का सर्टिफिकेट और पाकिस्तान जाने का वीजा तैयार करने में व्यवस्त हो जाता है| देश का आर्थिक विकास और मानवीय विकास कोसों दूर पीछा छुट जाता है क्युकी उसके विवेक पर भावनाएं हावी हो चुकी होती है| वो इस बात को बिल्कुल जानना नहीं चाहता कि वहाँ कि कंपनियां कैसे वहाँ से मजदूरों का शोषण करती है| कैसे चाइना की कंपनियां वातावरण का प्रवाह किए बिना पूरे विश्व को मौत के मुहँ में धकेल रही है| उससे इन सब से कोई मतलब नहीं होता|

वैसे तो युवा का समूह तब खूब जोरों शोर से तालियाँ पिटता है जब हमारे प्रधानमंत्री ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओं’ जैसे नारों से माताओं, बहनों, बेटियों पर जोर देने की बात करते है| लेकिन जब जमीनी स्तर पर आदर करने की बात आती है आदर तो छोडिए उन्हें कोर्नेरिंग करने की कोशिश जाती है जैसे मानों कोई हाशिया जैसा जगह हो और वहाँ धकेलने की कोशिश कर रहे हो| उदा. के तौर पर एक नेता है ‘शाजिया इल्मी’ जब वो दूसरी पार्टी में थी तो एक वर्ग तमाम तरह के भद्दे टिप्पणियां करता था|

जब वो स्वेच्छा से पार्टी बदलकर दुसरे में चली जाती है तो दुसरे वर्ग द्वारा वही काम किया जाता है| यही नहीं मेधा पाटेकर, किरण बेदी, इरोम शर्मीला जैसी औरतें जब खड़ी होती है तो उन्हें एक सिरे से नकार दिया जाता है| यहीं नहीं किसी पर लेफ्टिस्ट का हवाला देकर तो किसी को जयचंद और मौकाप्रस्त जैसे कड़े शब्दों का झेलना भी पड़ता है| हमारा बुद्धि-विवेक तो यह कहता है कि बेटियों को आगे बढ़ाए लेकिन भावना कहती है कि अगर बिना पूछे युगल जोड़ी शादी कर ले तो इज्जत के नाम पर उसे बर्बरता से ‘हॉनर किलिंग’ कर दिया जाए|

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