आज के दौर में आदिवासियों को पूछता कौन है?

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देश में आदिवासियों की वही हालात है जो कश्मीरी लोगों का है| निसंदेह दोनों लोग इसी अखंड भारत के हिस्सा है| कश्मीरी हमारे देश और मिलिटेंट के बीच सैंडविच बने हुए है और आदिवासी हमारे प्रशासन और नक्सलियों के बीच सैंडविच बने हुए है| 1931 की जनगड़ना में इन आदिवासियों के बारें में तब के जनगड़ना कमिश्नर ने लिखा “एक कुली.. कुली था…कुली है.. और कुली रहेगा”| यानी किसी भी ज़माने में इनके हालात नहीं बदल सकते| अफ़सोस की बात यह है कि गुलाम भारत में की गई टिपण्णी आज भी गलत नहीं है|

एटीएम-पेटीएम में उलझा हमारा बहुतायत समाज अपने को भारत कह उन्हें पीछे छोड़ने में कभी पीछा नहीं रहता| उनकी आवाजें कभी भी महानगरों तक पहुच नहीं पाती है| इसका मुख्य कारण अपने आप को अन्धादौड़ में अव्वल घोषित करने वाली संकीर्ण मानसिकता रहा है और जो इसके मुख्य माध्यम हो सकते है उन्हें सोनम गुप्ता की बेवफाई और बेतुके प्राइम टाइम दिखाने से फुर्सत नहीं मिलता है|

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जापानी बिमारी की वजह से मरे इनके बच्चों का दुःख किसी को नहीं है| कुछ गिने चुने पत्रकार जैसे राज्यसभा टीवी के पत्रकार श्याम सुन्दर जी उड़ीसा के मनकडिया आदिवासी से संवाद करते हुए जब वहाँ के बच्चो के शिक्षा के बारे में पूछते है तो सरकारी डिलीवरी की पोल खुलती नजर आती है| मुझे समझ नहीं आता कैसे 30 बच्चे मैट्रिक (10वीं) के एग्जाम देते है और उसमे से मात्र 5 बच्चे जैसे तैसे पास हो पाते है|

बड़े महानगरों के कॉलेजों जहाँ एडमिशन के कटऑफ 99% जाता है वहाँ इनके किसी भी बच्चे की पहुचने की सम्भावना लगभग ना के बराबर हो जाती है| ऐसे कैसे उन्हें मुख्य धारा में लाया जाएगा? श्याम सुंदर जी का एक और रिपोर्ट मध्यप्रदेश के शहरिया आदिवासियों के बारें में पेश करते है जिससे यह पता चलता है कि वहाँ आए दिन बच्चों की कुपोषण से मौत होती रहती है| फुले हुए पेट और पतले-पतले हाथ पैर वाले बच्चों की पीड़ा को दिखाने वाला भी कोई नहीं है|

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यही नहीं आज का जो हॉट विषय चल रहा है ‘अर्थव्यवस्था’ और इसके निवेश इसके अंतर्गत भी उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है| बिहार के ओरांव तथा थारू आदिवासी जनजाती और पूर्वोत्तर में राभा जैसी जनजातियों में औरतें खेस, साडी, कपडा और चादरों जैसी बुनाई के काम करती है| इसके एवज में उन्हें मात्र 50 रूपए प्रति खेस मिलता है| अगर 8-9 घंटा काम करे तो ज्यादा से ज्यादा दो खेस बना पाती है| उन्हें ज्यादा से ज्यादा दिन में 100 रूपए ही मिल पाता है जो सरकार द्वारा डिक्लेअर किया न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम है|

कम तनख्वाह मिलने के पीछे कारण यह है कि उनके बनाए हुए कपड़ों की पहुच दिल्ली के सरोजनी नगर मार्केट जैसी जगहों तक नहीं है| इन मार्केटों में विदेशी कपडे बड़े ही आसानी से पहुच जाते है लेकिन इसी देश के कपडे नहीं पहुच पाते है जो कि दुर्भाग्य है| कम डिमांड की वजह से औरतों का वेतन भी कम ही मिलता है|

इस नई अर्थव्यवस्था में तो किसानों और आदिवासीयों के भी गुणगान किया जा रहा है| लेकिन गुणगान की आड़ में जंगल नष्ट हो रहे हैं और खेती सिमट रही है| आदिवासी और किसान शहरों की ओर पलायन कर दिहाड़ी मजदूर या साधारण नौकर-कामगार बन गए हैं| आदिवासियों को बेशक नई रोशनी नया जमाना चाहिए| उन्हें भी अच्छा खाना, अच्छा स्कूल, अच्छा पहनावा, अच्छा स्वास्थ्य और  अच्छा इलाज चाहिए| उन्हें भी गरिमा और सम्मान की नागरिकता चाहिए| और उनके इन न्यूनतम अधिकारों के लिए सरकारों के पास क्या है|

एक नीति जो नाइंसाफी बन जाती है, एक फाइल जो जंगल को काटने वाली आरी बन जाती है, एक कानून जो उन्हें रातोंरात बेघर कर सकता है| आदिवासियों के विकास की झांकी देखनी हो तो आज जिसे लाल कॉरीडोर कहा जाता है उस पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडीशा से लेकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश तक फैले अपार जंगल और वहां के आदिवासियों का जीवन देखना चाहिए| उनके सामाजिक जीवन की व्याख्या राज्यसभा के पत्रकार श्याम सुंदर जी ने भी अपने सीरीज “मै भी भारत” कार्यक्रम में अलग अलग जगहों पर घूम कर किया है|

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सरकार को इनकी यादें तभी आती है जब बाहर से कोई मेहमान हमारे देश आता है| उसके स्वागत और अपने देश की संस्कृति का प्रदर्शन करने के लिए कुछ एक को ढूंढा जाता है| अन्यथा कोई नहीं पूछता| इनके हाथों द्वारा बनाए गए बांस से निर्मित वस्तुएं भी शहरी घरों में शोभा बढाने के खातिर जगह नहीं ले पाती है| चाइना से बने सामान बेहद सस्ते दामों में मिलने की वजह से इनकी पुछ कम हो जाती है| इसके पीछे भी एक गहरी वजह रही है| सरकार भी इंटरनेशनल कमिटमेंट से बंधी हुई है| सरकार चाह कर भी लाचार है|

WTO (वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन) जैसी संस्थानों में सरकारें कमिटमेंट करती रही है कि वो बाक़ी के देशों के व्यापार अवरोधित नहीं करेगी| वैश्वीकरण के युग में उनके मुद्दे चर्चा से परे रहते है| उनकी चिंताएं और दिक्कतों को मीडिया कवरेज भी नहीं मिल पाता है जो कि एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है| भारत आदिवासियों और किसानों का देश था और कमोबेश अब भी है| अब जंगल और खेत पर उनके स्वामित्व और उनके मूल निवास को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं| ऐसी अर्थव्यवस्था आकार ले रही है जो मूल निवासियों को बेदखल करने पर आमादा है|

सरकारें सड़कें लाती है, स्कूल बनवाती है, अस्पताल बनवाती है लेकिन इनकी गति और मजबूती के बारे में भी चर्चा करना आवश्यक है| भारत के आदिवासी कल्याण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि की कुल आबादी में करीब साढ़े आठ फीसदी लोग आदिवासी या जनजातीय समुदाय से आते हैं| साक्षरता की दर करीब 59 फीसदी है| यह आंकड़ा देश की कुल साक्षर आबादी की दर से काफी कम है|

मिजोरम और लक्षद्वीप के आदिवासियों में साक्षरता दर की स्तिथि काफी अच्छी है लेकिन आंध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश के आदिवासियों की साक्षरता दर देश की आदिवासी आबादी में सबसे कम है| आदिवासी आबादी की आधे से अधिक आबादी जनता गरीबी रेखा से निचे आती है| आदिवासियों की आधा आबादी मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडीशा, झारखंड और गुजरात में निवास करती है| इन्ही राज्यों से होकर रेड कॉरिडोर गुजरती है जहाँ सरकार और आदिवासियों के बीच हिंसक संघर्ष सदियों से चलता आ रहा है|

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यही नहीं उन आदिवासियों के सामाजिक स्तिथि का भी मूल्यांकन करना अनिवार्य है| उन आदिवासियों के घर, स्वास्थ्य और कुल जीवन देखिए| उनके बच्चों की पढ़ाई का स्तर देखिए, वे क्या प्राइमरी तक जा रहे हैं या उससे आगे भी, कितने आदिवासी बच्चे आज देश के उच्च शिक्षा माहौल का हिस्सा बन गए हैं| कितने आदिवासी डॉक्टर इंजीनियर या अन्य क्षेत्रों के एक्सपर्ट बने हैं| खेलों में कितनी आदिवासी प्रतिभाओं को मौका मिल पाया है| क्या वे सब के सब लोग नाकारा हैं या आलसी हैं या उन्हें अवसरों से वंचित किया जाता रहा है?

आदिवासियों के कल्याण के लिए देश में मंत्रालय है पूरा का पूरा एक सिस्टम है| लेकिन इस सिस्टम की आदिवासी विकास की चिंताएं किताबी जुमलों से आगे नहीं निकल पाई हैं| वे आदिवासियों को बाहर निकलने और बदलने के लिए कह तो रहे हैं लेकिन ये नहीं बताते कि किस कीमत पर और उसका प्रक्रिया क्या है| बातें हवा हवाई सी लगती है| सच तो यह है कि इनको कोई पूछने वाला किसी भी प्रकार की सही और सच्ची हितकारी संस्था नहीं है|

इनकी बुनाई, कढाई और बांस से निर्मित वस्तुएं हमारे अर्थव्यवस्था के पोटेंशियल हो सकते है लेकिन इसकी चिंता है किसको? पूरा तंत्र दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता के चारों और भ्रमण करने में ही व्यस्त रहता है| शहर में अपने आप को ढूंढते आए आदिवासीयों की जिंदगी सड़क के किनारे पहसुल, चाक़ू, सिलबट्टे बेचते-बेचते ही कट जाती है| इन्हें पूछता कौन है?

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