क्या सच में असुरक्षित है “भारतीय मुसलमान” ?

हिंदुस्तान का सबसे हॉट विषय है “धार्मिक असमानताओं की राजनीती”| हाल ही में उपराष्ट्रपति महोदय उप-राष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति के रूप में हामिद अंसारी को विदाई दी गई| विदाई समारोह में कुछ बातें ऐसी हुई जो प्राइम टाइम का हिस्सा बनी रही| हामिद अंसारी ने कहा था कि देश के मुस्लिमों में बेचैनी का अहसास और असुरक्षा की भावना है| अपने विदाई भाषण में कहा कि ‘अगर विपक्ष को निष्पक्ष तरीके से, स्वतंत्रता के साथ और बेबाकी से अपनी बात रखने की इजाजत नहीं दी गई तो लोकतंत्र, निरंकुश शासन में बदल जाएगा’| आगे कहते है “एक लोकतंत्र की विशिष्टता इससे पता चलती है कि वह अपने अल्पमत को कितनी सुरक्षा मुहैया कराता है| अगर विपक्षी धड़ों को निष्पक्षता से, स्वतंत्रतापूर्वक और बेबाकी से सरकार की नीतियों की आलोचना करने की इजाजत नहीं दी जाती है तो कोई भी लोकतंत्र, निरंकुश शासन में बदल जाएगा|”

भूतपूर्व उपराष्ट्रपति महोदय द्वारा कही गई बातों को समझने के लिए थोडा और नजदीक जाते है| यह सत्य है कि विपक्ष को निष्पक्ष तरीके से और स्वतंत्रता के साथ अपनी बातों को रखने की इजाजत होनी चाहिए| अब पहला सवाल यहाँ यह खड़ा होता है आखिर किस तरह की इजाजत की कल्पना माननीय उपराष्ट्रपति जी कर रहे है? विपक्ष सरकार को निरंकुश होने से बचाता है| विपक्ष का यह हक़ है कि वो अपनी बात रखे| इसके लिए किसी भी विपक्ष को किसी भी सत्ताधारी पार्टी से ना तो इजाजत लेने की कोई जरूरत नहीं है और नाही किसी ने विपक्ष का मुंह बंद कर रखा है| आखिर अपनी प्रतिरोध की स्वरें बुलन्द करने के लिए किसका हस्ताक्षर चाहिए? मेरे समझ से सत्य यह है कि विपक्ष बहुत कमजोर पड़ चुका है| इसके पीछे कारण यह है कांग्रेस| UPA 2 के दौरान हुए भ्रष्टाचार और उसके बाद हुए चुनाव में हार से ना तो सबक ले पाई है और नाही अपने आप को संतुलित करने में सफल रही है| आजादी के बाद से लगातार कांग्रेस एकल पार्टी के रूप में धाक जमाई हुई थी| कांग्रेस के अन्दर प्रतिरोध के स्वर थे तो सही लेकिन खुलकर सामने नहीं आ पाते थे|

पहली बात मुखालफत की आवाजें 1977 के चुनावी परिणाम के साथ दिखा जब जनता पार्टी ने सरकार बनाया| लेकिन लीडरशिप तब भी बरक़रार थी| उसी लीडरशिप की बदौलत बहुत जल्द ही कांग्रेस अपने रूप में वापस आ जाती है| कांग्रेस के बहुत बुरे वक्त आए है| पहले जब इंदिरा गाँधी की हत्या हो जाती है| उसके बाद जब राजीव गाँधी की हत्या हो जाती है| ठीक उसके बाद आर्थिक संकट देश पर आता है| सबको संभाल लेने में कांग्रेस सफल रहती है| इसके पीछे सिर्फ वही कारण है कि हर संकट के वक्त ‘लीडरशिप’ बहुत मजबूत होती थी| लेकिन आज के समय में कांग्रेस के पास कोई ऐसा नेता सामने नहीं आ पा रहा है जो ठोस तरीके से अपनी प्रतिरोध की स्वर को आगे ला सके| कांग्रेस में अभी भी बहुत दिग्गज लोग है| लेकिन अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल रखते हुए ऐसी चीजों से बचते है| जो दिग्गज लोग है वो मनमोहन सिंह की राहुल गाँधी द्वारा की गई सरेआम बेइज्जती कैसे भूल सकते है? मनमोहन सिंह की गलती सिर्फ इतनी थी कि क्रिमनल केस चल रहे कैंडिडेट्स को टिकेट ना देने की अध्यादेश ला रहे थे| तभी श्री गाँधी आते है और अध्यादेश फाड़कर देश के प्रधनमंत्री की बेईजती करते है|

See also  घनघोर संकट में छात्र राजनीती

दूसरी बात देश में वैकल्पिक राजनीती की भारी कमी है| उदाहरण के रूप में वर्तमान की स्तिथि को लिया जा सकता है| वैकल्पिक राजनीती के आभाव की वजह से विपक्ष का बढ़िया माहौल नहीं बन पा रहा है| ‘आम आदमी पार्टी’ का उदय शुरुआत में जरूर एक उम्मीद बनकर उभरा था लेकिन राजनीती के मैदान में घुलने में उसने बहुत ज्यादा समय नहीं लगा| वैचारिक अंतर से विपक्ष में बैठे बाकी के दल के नेताओं के साथ बढ़िया तालमेल भी नहीं बैठ पा रहा है| इसके पीछे वही कारण है कि कोई खुलकर सामने काम करने वाला नेता सामने पेश नहीं किया गया है| इसलिए इस कथन पर मै अपनी असहमतियाँ व्यक्त करता हूँ कि विपक्ष को स्वतंत्र रूप से बोलने की आजादी नहीं है| संसद में काफी समय मिलता है जहाँ से वो अपनी बातें ठोस तरीके से रख सकते है लेकिन रख नहीं पाते है| भुतपूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जी अपने अगले वक्तव्य में कहते है “एक लोकतंत्र की विशिष्टता इससे पता चलती है कि वह अपने अल्पमत को कितनी सुरक्षा मुहैया कराता है|”

इस कथन से मै सौ प्रतिशत सहमत हूँ कि ना सिर्फ लोकतंत्र की विशिष्टता बल्कि देश की मजबूती का भी पता चलता है कि वो अपने अल्पमत को कितने बढ़िया तरीका से सुरक्षित रख पाता है| लेकिन यहाँ से भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है कि आजादी के 70 साल बाद भी आखिर अल्पसंख्यक को हम सशक्त क्यों नहीं बना पाए है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? हमेशा बेचारगी के तौर पर क्यों पेश किया जाता रहा है? यहाँ तक कि हामिद अंसारी साहब ने भी उस अंदाज में अपनी बातें रखी जैसे मानो बेचारगी कूट कूट कर भरी हो| लोकतंत्र का एक अध्याय संघर्ष भी होता है| अपने हक़ और हुकुक के प्रति संघर्षशील बनने के बजाए बेचारगी के जैसी काल्पनिक चित्रण करने की क्यों कोशिश की जा रही है? थोड़ी बहुत प्रतिरोध की स्वरें टीवी पर नजर भी आती है तो धर्म या जाती से शुरू होकर क्रमशः तथाकथित धर्मगुरुओ और जातिवादी नेताओं द्वारा वही ख़त्म क्यों कर दी जाती है| यह लाइन बहुत मोटा लग रहा है| इसको थोडा और अन्दर जाकर झाकने की कोशिश करता हूँ|

See also  पड़ोसी महासागरों में भारत के लिए उभरते में नए खतरे

सिर्फ कुछ ही गिने चुने नेता है जो तार्किकता से सवाल उठा पाते है| अप्ल्संख्यक यदि कमजोर रहा है तो कहाँ दिक्कत रही है? 2005 में मनमोहन सिंह सरकार के वक्त सच्चर समिति का गठन किया गया था| सच्चर समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा की स्थिति अन्य समुदायों की तुलना में काफ़ी ख़राब है| सात सदस्यीय सच्चर समिति ने देश के कई राज्यों में सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों से मिली जानकारी के आधार पर बनाई अपनी रिपोर्ट में देश में मुसलमानों की काफ़ी चिंताजनक तस्वीर पेश की थी| क्या कभी उसकी असल वजह पता करने की कोशिशें की गई? आखिर हर क्षेत्र में देश के औसत से कम का आकडा क्यों दिखा? असल बात यही होनी चाहिए थी| तब से लेकर आजतक क्या बदला? अगर नहीं बदला तो क्यों नहीं बदला? और आगे सुधार के लिए क्या स्टेप्स लिए गए है यह महत्वपूर्ण बन जाता है| मुझे ऐसा लगता है कि इस समाज को हमेशा अँधेरे में रखा गया| धार्मिक भय दिखाकर ध्यान भटकाया गया|

मुझे ऐसा लगता है कि देश में कहीं किसी का किसी से भय जैसी कोई चीज नहीं है| बल्कि ऐसी बातें करके भय बनाने की कोशिश की जा रही है| कभी यह नहीं पूछा गया टीवी चैनल पर कि आखिरकार फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग लगातार कमजोर क्यों पड़ता गया? आखिर वहाँ के आसपास रहने वाले लोग बेरोजगार क्यों होते गए? कहाँ पर सरकारी नीतियाँ असफल रही? वहाँ पर रह रहे लोग जो उसमे काम करते थे ज्यादातर लोगों में मुस्लिम समुदाय से आते है| इस समाज का असल मुद्दे कभी टीवी के प्राइम टाइम बन ही नहीं पाए है| जो प्राइम में मुद्दे अब तक बनते आए है उसका उनके विकास और उनकी समृधि से कोई लेना देना ही नहीं है| इतिहास इस बात का गवाह रहा है भारत में मुस्लिम समाज को एक पैटर्न बनाकर उपयोग किया गया है| शाहबानो का केस कोर्ट में जाता है| मुस्लिम समाज के कुछ गिने चुने ठेकेदार को लगता है कि उनका धर्म किसी औरत की निजी समस्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है| उस वक्त के सरकार इस समुदाय को खुश करने के लिए कानूनें बनाकर कोर्ट के आदेश पलट देता है|

See also  भावुक होकर अपनी वास्तविक चिंताओं से ओझल होते लोग

ऐसे भेदभाव से जब दूसरा समुदाय नाराज होता है तो उसको खुश करने के लिए अयोध्या का विवादित बाबरी मस्जिद का दरवाजा खोल दिया जाता है| लोगों में नफरत बढ़ता चला जाता है| लोग दोनों तरह बेहिसाब मरते है| राजनितिक फायदा तमाम पार्टियों को मिलता रहता है| यह एक पैटर्न रहा है| आज भी वही पैटर्न चलता है| जब भी चुनाव होता है तो मुस्लिम सामाज को हमेशा डराने की कोशिश की जाती रही है| कभी उसके लिए एजेंडे नहीं पेश किए जाते है| वोट हमेशा डर दिखाकर माँगा गया है| डर का माहौल देश में कभी रहा ही नहीं है| यह कृत्रिम और राजनितिक एजेंडा रहा है| देश बहुत खुबसूरत है| लोग भी खुबसूरत है| राजनितिक मंच से निचे उतर से के देखे तो लोगों में अच्छा तालमेल और अच्छी व्यावहारिकता है| इसलिए ऐसे प्रतिष्ठित पद को शुशोभित करने वाले महामहिम के मुंह से ऐसी बातें बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती है| बतौर उपराष्ट्रपति एक अच्छे शासनकाल के लिए आपको धन्यवाद|

Spread the love

Support us

Hard work should be paid. It is free for all. Those who could not pay for the content can avail quality services free of cost. But those who have the ability to pay for the quality content he/she is receiving should pay as per his/her convenience. Team DWA will be highly thankful for your support.

UPI ID: [email protected]

"OR"

You can make secured payment by any means from here

Leave a Comment

error: Content is protected !!