अपने सिधांत से ओझल होते गैर सरकारी संगठन

होता ये है कि भले पुलिस शब्द हमारे कान के पास से गुजरे तो एक नेगटिव फीलिंग आ सकती है लेकिन जैसे NGO (गैर सरकारी संगठन) शब्द आता है एकदम परोपकारी वाली फीलिंग आने लगती है जैसे मानो हमारी हितो की रक्षा सिर्फ यही करते है पुलिस, चुने हुए नेता सारे के सारे थोड़े फीके से लगने लगते है| हालाँकि यह सही चीज नहीं है अगर NGO से संबंधित संस्थाओं के थोड़े करीब जाओगे थे तो बहूत सारी समीकरणों से रूबरू होने का मौका मिलेगा| इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सारे के सारे NGO वैसे ही है| काफी सारे NGO बिल्कुल अपने सैधांतिक तौर पर अच्छा काम भी कर रहे है|

एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग फैक्ट आपके हवाले कर रहा हु टाइम्स ऑफ़ इंडिया के साभार से, हर 600 लोगों पर एक NGO हमारे देश  में है वही हर 943 लोगों पर एक पुलिस| एक NGO में कितने सारे लोग काम करते है अब उसके हिसाब से अंदाजा लगा लीजिए कि कितने लोगों पर कितने एक्टिविस्ट काम करते है|इतनी भरी भरकम संख्या होने के बाद भी समस्या वही की वही है इसका कारण है कि ज्यादातर गैर सरकारी संगठन संवाद नहीं विवाद में विश्वास रखने लगे है| काफी सारे अच्छे भी है जो बहूत सच्चे काम कर रहे है लेकिन उनकी संख्या आज के तारीख में बहूत ही कम है|

ग्रीनपीस की कहानी

हाल में कुछ महीनों पहले एक बात निकल के आई थी कि सरकार ने बहूत सारी NGO को बंद कर दिया है| नाम है ग्रीन पीस 40 देशों के साथ समन्यवय बैठाकर काम करते थे| अगर इसके बारे में बढ़िया से जानने की कोशिश करोगे तो पता चलेगा कि इन्हें किसी ने बैन नहीं किया बल्कि नियम तोड़ने की वजह संभावित एक्शन लिया गया है| एक कानून है FCRA (फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट)  जो कहता है कि कोई भी NGO अपने मिले हुए फण्ड का 50% से ज्यादा पैसा अपने एडमिनिस्ट्रेशन जैसे प्रचार प्रसार, पोस्टर, होर्डिंग, घुमाई फिराई के लिए नहीं कर सकते| लेकिन वो लोग 60% से ज्यादा पैसा उपयोग करते रहे है|

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और कहाँ उपयोग करते थे उन पैसों का तो स्थानीय मजदूरों की गोलबंदी करके सरकार के खिलाफ बिगुल फुकने के लिए| थर्मल पॉवर, मीनिंग, नुक्लेअर पॉवर के उपयोग के लिए विरोध करते है| जो जहाँ है उसे पड़े रहने देने से विकास होगा या बढ़िया तरीके से उपयोग से विकास होता है| ऐसे में अगर सरकार लगाम कसती है जो अपने विदेशी फण्डो का उपयोग सामाजिक उद्देश्य के बजाए राजनितिक गतिविधियों के लिए करते है तो शायद गलत नहीं कहा जा सकता है| सच्ची असहमती लोकतंत्र की हिस्सा है लेकिन जब यह निजी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बाहरी देनदारों द्वारा प्रेरित हो जाए तो यह देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा साबित हो सकती है|

उनकी एक बड़ी ही इंटरेस्टिंग कहानी है बिहार के धरनाई गाँव के सन्दर्भ में| सरकार से अपील किया एक्टिविस्ट्स ने कि धरनाई जैसे गांवो तक बिजली नहीं पहुच पाती है इसलिए हमारे पास एक प्लान है यहाँ सोलर से बिजली बनाकर इन्हें दे सकते है| करोड़ों रुपये खर्च करके पूरा माइक्रो ग्रिड बैठाया जाता है यही नहीं एक्टिविस्ट लोगो यह भी तय करते है कि सोलर प्लेट US based Zemlin Surface Optical Corporation का ही होना चाहिए इसके लिए दबाव भी बनाया था| इसका समीकरण तो समझना होगा न कि आखिर उसी इक्विपमेंट के लिए क्यों फाॅर्स करते है|

जैसे ही बारिश का मौसम आया है उसका एफिशिएंसी कम हो गया और फिर वही काम स्थानीय लोगो को भड़काना शुरू कि सरकार बाकी के शहरों और दुसरे राज्य के गांवो को ‘रियल इलेक्ट्रिसिटी’ देती है और तुम्हे इन्ही माइक्रो ग्रिड के सहारे बेवकूफ बनाते है| अंत हुआ यूँ कि 1981 में नक्सलियों से मिलकर सारा का सारा ग्रिड तोडवा दिया गया इस चीज के मांग के लिए कि हमें रियल इलेक्ट्रिसिटी चाहिए तब से दिया जल रहा था आज का मुझे पता नहीं है कि क्या स्तिथि है| जबकी होना यह चाहिए था कि बारिश के मौसम के लिए कुछ बिजली स्टोर करने के लिए समाधान ढूँढना था बजाए इसके|

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उद्देश्य से भटकते

ऐसे और भी कई उदाहरण मिल जाएँगे जिनका उद्देश्य तक तय नहीं होता है कि उन्हें करना क्या है| मैंने कई ऐसे NGO भी देखे है जो दिन में फण्ड इकठ्ठा करते है तमाम तरह के तामझाम के द्वारा और शाम को पार्टी करते है| कॉलेज में ज्यादातर NGO लड़के और लड़कियों का मिलाप और एन्जॉय करने का एक प्लेटफ़ॉर्म साबित होता है| कुछ NGO वाले टूर पर भी जाते है और सेल्फी लेकर कवर फोटो में डालते है| ये तो नॉन सीरियस NGO की बातें थी और भी कई सारी बातें है इसके आधार पर अनुमान लगा लीजिए| लेकिन कुछ जो सीरियस है वो नौटंकी भी करते है| जै

से गाँव में जाएँगे विडियो बनाएगे इंटरव्यू लेंगे और इमोशनल होकर चाइल्ड लेबर और न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलने पर अपनी पीड़ा व्यक्त करेंगे| बस कहानी ख़त्म इसका हल कौन ढूंढेगा ? इसका कोई प्लान नहीं होता है| जबकी ऐसे समस्याओं का निदान ढूँढना ही उनका पहला उदेश्य है| वो इन समस्याओं के निदान तक तब तक नहीं पहुच सकते जब तक एक विचार वाली धारणा से ऊपर नहीं उठते| क्युकी उनका निष्कर्ष और एक्शन तय होता है कि विरोध करना ही है चाहे कुछ भी हो जाए| और उसके लिए एविडेंस ढूढने में लग जाते है और बहूत मेहनत करते है जो सही दिशा में नहीं है|

उन्हें पहले समस्या का सही रूप से विश्लेषण करना चाहिए और उस विश्लेषण और मूल्यांकन के आधार पर हल ढूंढने के लिए आगे बढ़ते रहना चाहिए| एक उदाहरण से बेहतर तरीका से समझ सकते है जैसे गाँव में जाकर चाइल्ड लेबर और न्यूनतम मजदूरी ना मिलने वाली समस्या पर डाकमेंट्री बनाते है और उसके सामानांतर FDI को भी कोसते है अपने तर्कों से| शायद वो लोग भी जानते होंगे कि FDI उनके द्वारा व्यक्त किए गए सो कॉल्ड पीड़ा का समाधान FDI भी हो सकता है जिससे पंजीकृत होने के बाद सिस्टेमेटिक तरीके से मेहताना और चाइल्ड लेबर जैसी समस्याओं से निजात पाया जा सकता है|

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लेकिन ऐसा होता नहीं है उनके डिक्शनरी में FDI जैसे तमाम विकास वालें शब्दों का शाब्दिक अर्थ ही विरोध होता होगा| होता यह है कि सिर्फ एक पहलु के तरफ ही झाकने की कोशिश करते है| आज कल के NGO वाले लोग किसी सुझाव पर पहुचना नहीं चाहते| चाहिए ये कि गैर सरकारी संगठन के एक्टिविस्ट्स किसी भी समस्या के लिए संवाद करें और अक साफ़ लाइन खीचकर एक निष्कर्ष पर पहुचे| लेकिन ऐसा होता नही है विरोध करना उनका लगभग पर्यावाची शब्द बन सा गया है|

अंत में निष्कर्ष के रूप में मै यही कहना चाहूँगा कि इसमें काफी सुधार की जरूरत है| चुकी आईबी की रिपोर्ट में भी ऐसे NGO को आंतरिक सुरक्षा का खतरा बताया है| विदशो से फण्ड पाने वाले बहूत सारे ऐसे NGO है जिनका नियमतः पंजीकरण नहीं हुआ है| यहाँ तक कि गृह मंत्रालय कि रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि भारत में 20 लाख NGO है लेकिन 2% से भी कम है जो FCRA के तहत पंजीकृत है| बहूत सारे ऐसे भी है जो नियमतः अपना वैधानिक वार्षिक रिपोर्ट तक जमा नहीं करते| इसलिए हर समस्या के दो पहलु होते है सकारात्मक भी आयर नकारात्मक भी|

बस NGO चलते समय हमें ध्यान में ये रखकर काम करना चाहिए कि नकारात्मक चीजे सकारात्मक पर ज्यादा हावी न हो| और उसी आधार पर एक महीन लाइन खीचकर एक निष्कर्ष पर पहुचना चाहिए ताकी विकास का काम रुके नहीं| दूसरी बात यह कि जो नियम कानून बनाएं गए है उसे नियमित रूप से पालन करते रहे| संसदिए घेरे के अन्दर रहकर अच्छा करने का प्रयास करे जिससे ऐसी संस्थाओ को हर किसी से प्रोत्साहन मिल सके|

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2 thoughts on “अपने सिधांत से ओझल होते गैर सरकारी संगठन”

  1. बहुत अच्छा आर्टिकल लिखा है गौरव जी। अधिकतर एनजीओ की यही सच्चाई है। बहुत से एनजीओ विदेशों से पैसा लेते हैं तो बहुत से ऐसे भी थे जिनहे पिछली सरकार से खूब पैसा मिलता था। सलमान खुर्शीद जी का किस्सा याद होगा। जब उन पर विकलांगो के 71 लाख रुपए एनजीओ के जरिये हड़पने का आरोप था। सच था या झूठ मालूम नहीं। लेकिन ये समझ मे आया था की एनजीओ को सरकार से बहुत पैसा मिलता है। खुली लूट। कितने इन पैसो को गरीब जनता के लिए इस्तेमाल करते हैं जांच का विषय है। इन एनजीओ के पीछे कितने नेता हैं ये भी जानना चाहिए। एनजीओ सिर्फ भलाई करने के लिए नहीं हैं। बल्कि लूट का पूरा एक चक्र है।

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