बढ़ती महंगाई देश के लिए चिंता का विषय क्यों है?

इस आलेख में…

इतिहास इस बात की साक्षी रहा है कि भ्रष्ट्राचार, बेरोजगारी, और महंगाई ये तीन ऐसे बिंदु है जो हमेशा से सत्ता में आमूल चुल परिवर्तन करने की क्षमता रखते है चाहे कोई भी तंत्र क्यों न हो – उदाहराण के तौर पर सऊदी में इस्लामिक तंत्र तभी तक संभव है जब तक ये तीनो में एक संतुलन है और यह बात वहाँ की राजशाही को भी पता है| यह संतुलन इसलिए संभव क्युकीं तेल पर्याप्त पैसे देते है जिससे लोगों पर खर्चा किया जा सकता है| लेकिन बाकी के देशों जैसे भारत के साथ ऐसा नही है| इसे खर्च करने के लिए उतना कमाना पड़ेगा|

करोना काल के बाद से भारत में महंगाई निरंतर बढ़ रही है – चाहे बात खाना बनाने वाले तेल की हो या इंधन वाले तेल की हो| गैस की सब्सिडी रुकी हुई है और रेल यातायात में जो वृद्ध लोगों के कन्सेशन थे वो भी बंद है| इसके उलट लोगो के आए बढ़ोतरी तो दूर की बात उलटे या तो करोना के तर्क पर रुकी हुई है या घटा दी गई है या नौकरी से निकाल दिया गया है| सरसों तेल हर पकवान का एक महत्वपूर्व अंग है जो 200 रु प्रति लीटर पार कर चूका है| ऐसे ही पेट्रोल डीजल पर बढ़ने वाले कीमत का असर अमूमन सभी वस्तुओं पर पड़ता है| आज पेट्रोल की कीमत लगभग 120 रु प्रति लीटर छूने को है|

 

महंगाई क्यों और कैसे?

एक सवाल अमूमन समझदार इन्सान के जेहन में आना चाहिए – ‘आखिर सरकार ऐसा क्यों चाहेगी कि महंगाई बढे यह जानते हुए कि महंगाई से सीधा असर उसके वोट पर पड़ता है?’ दिल्ली में चाहे जिस भी पार्टी की सरकार हो, वो बिल्कल नहीं चाहेगी कि भ्रष्ट्राचार उफान मारे, बेरोजगारी बढ़े और महंगाई आसमान छुए| फिर भी तंत्र कभी कभी असहाय क्यूँ दिखता है? समस्या किसी भी पार्टी वाली सरकार में नही है| यह एक राजनितिक मजबूरियाँ होती है कि विपक्ष उनको उठाए और वो सत्ता में आए| फिर जब सत्ताधारी पार्टी विपक्ष में आए तो वही काम करे| पैरेटो की भाषा में कहें तो इलीट वर्ग का सर्कुलेशन जारी रहता है|

 

तो फिर क्या कारण है? असल समस्या संरचना में है| जर्मन राजनितिक वैज्ञानिक, हैबरमास इस समस्या को कई दशक पहले पहचान गए थे| वो कहते है कि आर्थिक और राजनितिक तंत्र के बीच तालमेल नहीं बैठने की वजह से एक संकट पैदा होता है| हमारा आर्थिक तंत्र उदारवादी है लेकिन हमारा राजनितिक तंत्र समाजवादी है| जिससे हमारे देश की आए होनी चाहिए वो ‘अधिकांश मुनाफे पर आधारित है| ऐसे में बिज़नेस डेवलपमेंट के नाम पर बेरोकटोक छुट यहाँ तक कि करोना के समय कई राज्यों में लेबर कानूनों को भी स्थगित कर दिया गया| टैक्स में भी छूट दी जाती है| अधिकांश मुनाफे पर आधारित होने की वजह से सरकार को बिज़नस से आमदनी कम हो रही है|

 

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यही कारण है कि वर्ष 2021 में सरकार को सबसे ज्यादा आए हुई है GST से हुई, जिसका टैक्स एक भिखारी भी भरता है जब वह कोई भी वस्तु खरीदता है| दुसरे नंबर पर सरकार की आए का श्रोत है लोगों द्वारा दिए गए प्रत्यक्ष टैक्स| तीसरे नंबर पर कॉर्पोरेट टैक्स जिसे पहले नंबर पर होनी चाहिए| जब सरकार की आए कॉर्पोरेट से रुक जाए और लोकतांत्रिक महत्वाकांक्षाएँ वोट बैंक पॉलिटिक्स की वजह से बढ़ जाए तो ऐसे में लोगों के जेबों पर असर पड़ना लाजमी है| सरकार को आर्थिक डेटा भी टाइट रखना है, वोट के लिए लुटाने भी है और आय भी नहीं रुक गई हो तो ऐसे में अप्रत्यक्ष टैक्स एक सीधा उपाय दिखता है| यही कारण है कि सबसे ज्यादा असर वस्तुओं पर पड़ रहा है|

 

महंगाई के चक्रविहू

ठीक इसी तर्ज पर स्वाथ्य सुविधाएँ महँगी हो गई| Health insurance’ में लोगों को लगता है कि वो फायदे में है असल में वही घाटे में है| Insurance के आने के बाद लोगों ने हॉस्पिटल में होने वाले खर्चों का फिक्र छोड़ दिया| ऐसे में अस्पतालों ने मनमानी तरीके से अपने रेट बढ़ाने शुरू किए| जब इसका असर insurance कंपनियों पर पड़ा तो कंपनियों से अपने प्रीमियम बढ़ा दिए और बहुत सारे किंतुपरंतु अपने टर्म्स में डाल दिए| अंततः लोगों के जेब पर ही असर पड़ा – उनके भी जिन्होंने insurance करवाए है और उनके भी जिन्होंने नहीं करवाएँ है|

 

सरकार ने आयुष्मान भारत जैसे कार्ड ने हेल्थ बिज़नस को लूटने का एक और मौका दे दिया| आयुष्मान भारत के अंतर्गत, सरकार 5 लाख रूपए प्रति वर्ष तक की मुफ्त इलाज की सुविधा दे रही है जो कि सरकारी या प्राइवेट दोनों में होगा| स्वाभाविक सी बात है कि सभी लोग प्राइवेट की तरफ भागेंगे| प्राइवेट मनमाने तरीके से अपने रेट बढ़ाएंगे और ख़ूब लूट होगी क्युकी ये पैसा लोगों के जेब से नहीं जाएगा| फाइनेंसियल एक्सप्रेस के रिपोर्ट के हिसाब से दो करोड़ से ऊपर लोग आयुष्मान भारत का फायदा ले रहे है| इससे बेहतर होता कि इतने की सालाना पैकेज पर उन्हें नौकरी दे दी जाती| ना सिर्फ स्वस्थ्य बल्कि इसी पैसे में बाकी के भी चीजों का देखभाल कर पाते| ऐसे में अभी सबसे ज्यादा मुनाफ़े में प्राइवेट अस्पतालें ही है|

 

स्वास्थ्य के अलावां अमूमन यहीं हाल शिक्षा के क्षेत्र में भी है| सरकारी स्कूल के शिक्षक की गुणवत्ता हमेशा प्राइवेट से अच्छी होती है क्युकी ये लोग शिक्षक के परीक्षा पास करके आते है| तब भी सरकारी शिक्षा का बुरा हाल है| भारत के अग्रणी राजनितिक वैज्ञानिक, शिक्षा में राजनितिकब्यूरोक्रेटिक नेक्सस पर प्रकाश डालते आए है| हिंदुस्तान में ज्यादातर प्राइवेट स्कूल राजनितिक घराने के रहे है| इससे ना सिर्फ आर्थिक बल्कि वोट ध्रुवीकरण का भी लाभ मिलते आया है| इस नेक्सस ने जानबूझकर सरकारी स्कूलों की हालात बुरी रखी| इसका परिणाम यह हुआ कि शिक्षा के क्षेत्र में महंगाई बहूत तेजी से बढ़ी|

 

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महंगाई का गणित

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) के रिपोर्ट के अनुसार हिंदुस्तान में 23 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के निचे गुजर बसर करते है| यूनाइटेड नेशन के रिपोर्ट के हिसाब से यह आकड़ा 28% है| इसका मतलब यह कि लगभग एक चौथाई ऐसी जनता है कि गाँव में दिन के 23 रुपया और शहर में दिन के 32 रुपया भी नहीं कमा पाती है| गरीबी रेखा के निचे रहने वाले लोगों को सिर्फ एक लीटर सरसों तेल खरीदने के लिए उससे 10 दिन से ज्यादा कमाना पड़ेगा| एक गैस सिलिंडर को रिफिल करवाने की कीमत है लगभग 900 रुपया| एक गरीबी रेखा के निचे रहने वाले को भरवाने से लिए 1 महीने से भी ज्यादा कमाना पड़ेगा|

 

कुल मिलाके देश की एक चौथाई जनता इस महंगाई को झेलने असमर्थ है| जब तेल की कीमत बढ़ते है तो दूध, सब्जी और बाक़ी के सामानों का भी दाम बढ़ता है क्युकी यातायात के खर्चे बढ़ जाते है| यही नहीं इसका असर अर्थव्यस्था और बेरोजगारी पर भी पड़ेगा| तेल का सीधा संबंध ऑटोमोटिव इंडस्ट्रीज से है| जब तेल के दाम बढ़ेंगे तो लोग गाड़ियाँ कम खरीदेंगे| गाड़ियों का प्रोडक्शन कम होगा| कम बिक्री होने की वजह से ऑटोमोटिव इंडस्ट्रीज अपने यहाँ से लोगों को हटाना शुरू करेगी| पहले से बुरी स्तिथि में पड़ी ऑटोमोटिव इंडस्ट्री का ग्रोथ और निचे जाएगा| ऐसे में “मेक इन इंडिया” महज नारों तक ही सिमित रह जाएगा|

 

ऐसे में ‘स्क्रेप्पिंग पालिसी’ का भी कुछ ख़ास मतलब रह नहीं जाएगा| स्क्रेप्पिंग पालिसी के तहत सरकार ने वादा किया था कि कमर्शियल गाड़ियाँ जो 10 साल से पुरानी हो या व्यक्तिगत गाड़ियाँ जो 15 से पुरानी हो उसकी स्क्रेप्पिंग करके नई गाड़ियाँ लेने में सरकार और कंपनी दोनों मदद करेंगी| ऑटोमोटिव इंडस्ट्रीज का रुकने से उन छोटी कंपनियों पर भी असर पड़ेगा जो इसके लिए पार्ट्स बनाती है| जन उनकी बिक्री कम होगी तो वो छोटी कंपनियां भी अपने यहाँ से लोगों को नौकरियों से निकलेगी| इससे बेरोगजारी बढ़ने की रफ़्तार और तेज हो जाएगी| इसलिए तेल से पैसा बनाना बेहद बेकार विचार है|

 

नव उदारवादी नीतियां आज सरकार के बहाने बन गए है| जब भी कभी अहित होता है तो दोष मार्किट को दिया जाता है और जब अच्छा होता है तो पीठ अपना थपथपाया जाता है| नवउदारवादी व्यवस्था में एक और संरचनात्मक दोष यह है कि वस्तुओं के दाम तो मार्किट के साथ जुड़े है लेकिन लोगों कि आय स्थिर है| उदहारण से तौर पर एक साल में सरसों के तेल का दाम 80 रु (2020) से 200 रु (2021) हो गया यानी की 150% की वृद्धि| लेकिन क्या लोगों के आय में इतने प्रतिशत का वृद्धि हुआ है? शायद नहीं| ऐसे में लोगों के खरीद करने की क्षमता कम होगी| परिणामस्वरूप इसका असर भारत के जीडीपी पर भी पड़ेगा|

 

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महंगाई चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?

महंगाई, बेरोजगारी, और भ्रष्टाचार मुद्दा इसलिए नहीं बन पाता क्युकी यह महज राजनितिक पार्टियों तक ही सिमित रह जाता है| इसका उद्देश्य इलीट के सर्कुलेशन तक ही रहता है| यह जनमानस का मुद्दा नही बन पाता| अन्ना आन्दोलन से वक़्त भ्रष्टाचार के खिलाफ वैसा वातावरण बना जरूर था लेकिन सरकार के बदलाव के बाद वो थम सा गया| जाती और धर्म की राजनीती ऐसे मुद्दों को ब्लर करने में सफल रही है| ऐसा इसलिए हो पाता है क्युकी हमारी संस्कृती स्पिरिचुअल रही है| इसके साथ छेड़छाड़ करना राजनितिक लोगों के लिए आसान होता है|

 

इसके अलावां इसे ‘हन्ना आरेंटकी ‘बेनालिटी ऑफ़ एविल’ के सहारे भी समझा जा सकता है| महंगाई, बेरोजगारी, और भ्रष्टाचार यह ‘मामूली बन गया है| ये सभी मुद्दे आज के समाज के एक नार्मल बात बन चुकी है| जो इसके खिलाफ बोलता है उसे Abnormnal समझा जाता है| एन मुद्दों में वो जान नहीं रही है कि एक भीड़ इकठ्ठा कर सके| यही कारण है कि आज देश में पेट्रोल की कीमत 120 रूपया प्रति लीटर और सरसों तेल 200 रुपया प्रति लीटर होने के बाद भी इलेक्शन दूर, ना तो मीडिया के लिए मुख्य चिंता का विषय रहता है और नाही आम जनमानस का|

 

इसलिए, लोगों को चाहिए कि सरकार पर दबाव बनाए| मीडिया को चाहिए कि लोगों की बातों को प्रखर तरीके से रखे| सरकार को महंगाई का कारण बताने के बजाए इसपर काम करना चाहिए ताकी बाहरी प्रभावों को कम कर सके| उन वस्तुओं का महंगा होना जिससे आम जनमानस का प्रतिदिन सरोकार हो यह लोकहित में कतई नहीं है|

Footnotes

  1. अमर उजाला | कोरोना संकट के बीच सरसों के तेल के दाम 200 पार
  2. टीवी 9 हिंदी | देश के इन जिलों में 120 रुपये के पार हुआ पेट्रोल, 110 से ऊपर गया डीजल
  3. Hindustan Times | Oct GST revenue hits new high at ₹1.3L-cr
  4. Financial Express | Ayushman Bharat crosses 2-crore mark in hospital admissions
  5. Down to Earth | Mass poverty is back in India
  6. Times of India | Edible oil rises from Rs 80 to Rs 180 in 11-year high
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