नई कृषि बाज़ार व्यवस्था: किसान, सियासत और हकीकत

किसी भी महत्वपूर्व विषय से ध्यान भ्रमित करना हो या कहें तो उसे बर्बाद करनी हो तो एक छोटी सी ‘भावनात्मक छौंक’ पर्याप्त है| बचपन की शिक्षा कहती है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है| लेकिन इसके बावजूद कृषि एक गरीबी की पेशा क्यों है? इसका अगर कोई एक कारण मुझसे पूछे तो मै यही जवाब दूंगा कि ‘भावनात्मक छौंक’ की वजह से लोगो किसानों की विवेक पर भावनाएँ हावी हो जाती है| यह तार्किक रूप से उन्हें कमजोर बनाती है| मेज पर उनकी बारगेनिंग क्षमता को कमजोर करती है| ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ कृषि के क्षेत्र में है| यह बात नारियों के सन्दर्भ में भी फिट बैठता है|

लड़कियों को एक देवी की रूप में प्रस्तुत करना उनकी उस स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की कोशिश करता है जिसे पुरुष पसंद नहीं करते है| देवी-देवता तो अंतिम सत्य है| हाँ या ना करते करते मानवीय ‘अंतिम सत्य’ के ढांचे में फिट हो ही जाना पड़ता है| इसका एक सन्दर्भ इतिहास में भी मिलता है जब गाँधी जी दलितों को ‘हरिजन’ के रूप में पुकारने के लिए आग्रह कर रहे है| इस डॉ. आंबेडकर ने गाँधी का विरोध यह बात कहकर किया कि वो दलितों के साथ हुए अत्याचारों पर पर्दा डाल है|

इसलिए किसी भी मुद्दे को भावना से ऊपर उठकर तार्किक रूप से देखने की जरूरत है| सभी कार्यो की महत्ता एक बराबर है| बस फर्क इतना है कि सभी कामों के मूल्य अलग-अलग है| इसलिए तो एक नाई की मेहनताना एक वकील की मेहनताना से कम है| बिना सैलरी के ना तो एक जवान सरहद पर खड़ा होगा, नाही बिना पैसे का एक किसान मुझे अपना आनाज देगा और हम और आप किसी भी ऑफिस में बिना सैलरी के एक दिन भी काम करना पसंद करेंगे| किसी भी काम को ‘वरिष्ठता’ के खांचे में बाँटने से कुछ फायदा तो होता नही बल्कि नुकसान ही होता है|

इस लेख में किसान के महत्वपूर्ण मुद्दे की बात कि जाएगी| किसानों के चल रहे आन्दोलन पर भी चर्चाएँ की जाएंगी| इसके साथ साथ आन्दोलन कर रहे किसानों की मांगों पर भी विस्तार से चर्चा किया जाएगा कि उनकी बातें कहां तक वर्तमान स्तिथि के साथ मेल खाती है| इसके अलावां कृषि विशेषज्ञों द्वारा दिए गए सुझाओं में से कौन सी बातें है जो सरकार को अपनाना चाहिए|

लगभग एक महिना होने को जा रहा है जहाँ किसान अपने कुछ जायज मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे है| देश की जनता ‘किसान आन्दोलन’ और ‘राजनितिक आन्दोलन’ के डाइलेमा की वजह से किसानों की असल बातों को सुन ही नहीं रहे है| इस आन्दोलन के कई हीतधारक (Stakeholders) है| पहला, इस आन्दोलन के पहले नायक किसान है जो सरकार द्वारा लाए गए नए तीन कानूनों का विरोध कर रहे है| दूसरा, इस आन्दोलन से मुख्यक सपोर्टिंग नायक राजनितिक नेता है| साधारणतः लोकतंत्र में पार्टी की आयु ज्यादा से ज्यादा 10 साल होती है| उसके बाद विरोधी लहर (anti-incumbency) चलने लगती है|

राष्ट्रीय दल (कांग्रेस) के लिए अच्छा मौका है| क्षेत्रीय दलें (चाहे बात ‘AAP’ की हो या ‘TMC’ की) अपने अपने स्तर अपना हीत साध ही रहे है जिनका चुनाव नजदीक है| तीसरा, इस आन्दोलन में मीडिया के भी अपने हीत है उन्हें बिना ख़ास मेहनत का न्यूज़ मील रहा है| चौथा, वामपंथी गुट जो इस आन्दोलन में किसान बनकर ऐसे घुस चुके है कि किसानों की डिमांड लिस्ट में अपने कामरेडों को रिहा करवाने की बातों को जोड़ने में सफल रहे है| पांचवा, इसमें कुछ आदाकार (खालिस्तान सुप्पोर्टर) ऐसे भी है जिनकी भूमिका पर अगर कैचीं चल जाए, तो भी पूरी कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा| दुर्भाग्य की बात यह है कि मीडिया ऐसे आदकारों को मुख्य नायक के तौर पर पेश कर रही है|

यह लेख सिर्फ मुख्य नायक पर अपना फोकस रखेगा| किसान नए कानूनों के विरोध इसलिए कर रहे है क्युकी उन्हें ऐसा लग रहा है कि ये बदलाव उनके वहां पर चल रहे सफल व्यवस्था को अव्यवस्थित कर देगी| यह एक सच्चाई है देश में अगर कहीं कृषि बाज़ार की व्यवस्था दुरुस्त है तो वो पंजाब ही है| लेकिन एक सच यह भी है जिसकी चर्चा कृषि अर्थशास्त्री, अशोक गुलाटी जी, कर रहे है| उनका मानना है कि ‘हरित क्रांति’ से खेती के प्रोडक्शन के दिशा में तो खूब विकास हुआ लेकिन बाजार का विकास नहीं होने से उपज का निकासी नहीं हो पाया| यही कारण है या तो आनाज गोदामों में सड़ते दिखते या ना बिकने की सूरत में किसान फसलों को सड़कों पर नस्ट करते दिखे है| इसलिए बाज़ार की संरचना में बदलाव समय की जरूरत है|

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लेकिन इसपर यह सवाल खड़ा होता है कि फिर पंजाब में कैसे सफल रहा AMPC और MSP की व्यवस्था| इसके पीछे का कारण है कि कृषि वहाँ की चुनावी मैनिफेस्टो का मुख्य हिस्सा है| वहाँ का सामाज किसी अन्य आइडेंटिटी पर नहीं बटा है जैसे उत्तरप्रदेश और बिहार की आवाम जाती के खांचे में चुनावी रूप से बाँट दिए गए है| इसके अलावां वहां का समाज ‘सामुदायिक’ रूप से मजबूत है| हिंदू धर्म के ‘निष्काम कर्म’ को सही मायने में सिख लोगों ने अपनाया है| लंगर का निस्वार्थ सेवा भाव इसका जीता जागता उदहारण है| यही कारण है मंडी चाहते या न चाहते हुए भी समुदाय की अनदेखा करने की क्षमता नहीं रखती|

कृषि के तीनों नए कानूनों में कहीं भी मंडी या MSP ख़तम करने की बात नहीं लिखी है| फिर क्यों किसान नए किसानों से चिंतित है? एक पैटर्न है जो उनकों चिंतित करती है – पहला, जिस तरह से खेती की लागत और महंगाई बढ़ रही है, उसी रफ़्तार से MSP की दरें नहीं बढ़ रही है| दूसरा, सरकार स्वामीनाथन समिति की अनुशंसा को लागु करने से हमेशा भागती रही है जिसमें वो सरकार से आग्रह करते है कि MSP की को दर है वो उपज के कम से कम डेढ़ गुना होनी ही चाहिए| तीसरा, कृषि लागत और मूल्य आयोग जो सरकार की सलाहकार है उसने सरकार को यह सलाह दे चुकी है कि सरकार को खुले में खरीदना बंद कर देना चाहिए|

चौथा, राष्ट्रीय कृषि आयोग ने सरकार से आग्रह किया था कि देश में मंडियों की संख्या कम से कम 41000 होनी चाहिए जिससे की हर किसान को 50 किलोमीटर के दायरे में एक बाजार हो सके| वर्तमान की सच्चाई यह है कि 2019 में मंडियों की संख्या मात्र 6630 है| अगर सरकार वाकई में APMC और MSP को कायम रखना चाहती है तो फिर मंडियों की संख्या क्यूँ नहीं बढ़ा रही है? छठा, 2014 में मोदी सरकार द्वारा बनाए गए शांता कुमार समिति ने यह दावा करते हुए सांकेतिक रूप से APMC को खत्म करने की मांग की कि सिर्फ 6% किसान APMC का उपयोग करते है|

शांता कुमार जी का 6% सुनने में बड़ा छोटा अंक लगता है| यह अमूमन सभी के मन को ठंडा कर देने के लिए काफी है कि क्या फर्क पड़ता है अगर मंडी बंद कर दी जाती है| इस 6% का भी कोई छोटा अंक होगा जो पंजाब के किसान है| उस 6% से छोटे अंक में महत्ता बहुत ज्यादा है| पहला, ‘डाउन टू अर्थ‘ मैगज़ीन के आकड़े कहते है कि पंजाब का बाजार व्यवस्था रोजगार के रूप में 36,000 अरहतिया लोगों (बाजार व्यस्था में लगे लोग) और 3 लाख मजदूरों को अपने अंदर समाती है|

दूसरा, पंजाब की बाज़ार व्यवस्था पंजाब जैसे राज्य को जहाँ उद्योग ना के बराबर है उसे सालाना 6,000 करोड़ की आय प्रदान करती है जो की पंजाब की इकॉनमी का एक बड़ा हिस्सा है| बिहार चुनाव में नितीश जी यह जरूर कह रहे थे कि बिहार समुद्र के किनारे पर नहीं है इसलिए बिहार में उद्योगपति नहीं आना चाह रहे है जो रोजगार दे सके| यह चुनौती पंजाब के साथ भी है लेकिन पंजाब ने उसपर फोकस किया जो उसका स्ट्रेंथ था| बिहार के लिए यह एक बड़ी सीख भी है| तीसरा, यहाँ तक कि मंडी खुद शुल्क के माध्यम से लगभग 3,642 करोड़ से ज्यादा पैसे कमाती है| ध्यान देने की बात यह है कि यह शुल्क किसान से नहीं वसूला जाता बल्कि खरीद बिक्री करने वाले व्यवसायी भुगतान करते है|

मंडी द्वारा वसूले गए शुल्कों को वहाँ के विकास के कामों में लगाया जाता है| जैसे मंडी बोर्ड के पैसे से शहर से गाँव को जोड़ने वाली 70,000 किलोमीटर सड़कों की देखभाल करते है जो की ग्रामीण अर्थव्यस्था को दुरुस्त करने में मदद करते है| खेती से निकले पैसों का लाभ अन्य व्यवसायों को भी होता है जो ग्रामीण अर्थव्यस्था से जुड़े होते है| इसके अलावां उन पैसे से गाँव की सड़कें भी सुधारी जाती है| ये पैसे एक तरह से विषम परिस्थिति में किसानों के शॉक को भी झेलने की क्षमता रखते है| ऐसे ही परिस्थितियों के लिए फसल बीमा कराए जाते है| लेकिन पंजाब का मंडी सिस्टम इतना डायनामिक है कि एक तरह से बीमा को भी एक कवर फायर देता है|

इसलिए इसमें कोई शक नहीं है कि पंजाब का बाज़ार व्यवस्था सफल रही है| यह व्यवस्था ना सिर्फ किसानों को पूरा MSP दिलाने में मदद करती है बल्कि रोजगार का सृजन करने की भी क्षमता रखती है| सिर्फ पंजाब का कृषि बाज़ार लगभग साढ़े तीन लाख लोगों के लिए रोजगार का सृजन करता है| 2017 में भारत के कुल उद्योगों ने 11 मिलियन मजदूरों को रोजगार दिया था| अगर इसका प्रतिशत निकला जाए तो 3.18% रोजगार सिर्फ पंजाब का अदना सा कृषि बाज़ार दे देता है जो कि शांता साहब के रिपोर्ट के अनुसार 6% के भी एक छोटे से हिस्से द्वारा चलाई जाती है|

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किसानों के तीन बड़े मांग है जिसे सरकार ने अपने प्रस्ताव में स्वीकार्य भी किया है| पहला, MSP की गारंटी दी जाए| दूसरा, APMC मंडी बरक़रार रहेगी इसको सरकार सुनिश्चित करे| तीसरा, कॉर्पोरेट फार्मिंग के दौरान विवाद के परिस्तिथि में नौकरशाह की जगह न्याय का रास्ता अख्तियार करने का मौका दिया जाए| लेकिन सरकार वैसे गारंटी नहीं दे रही है जैसे की किसान मांग रहे है| किसानों की मांग है कि MSP को कानून के खूंटे से बांधा जाए ताकी किसी भी कीमत पर दर उससे निचे नहीं जाए| बाजार पर पूरी तरह से निर्भर होने के फायदे के साथ साथ घाटे भी है| यह भी संभव है कि बाज़ार के अनुसार दर MSP से भी ज्यादा मिले|

पहला, लेकिन अगर पेट्रोल के सामानांतर रखकर देखे तो तो स्तिथि सही नहीं है| कई राज्यों में पेट्रोल की कीमतें 90 क्रॉस कर चूका है| किसी को भी नहीं पता कि 2021 के बाद पेट्रोल की कीमत 100 भी पार कर जाए| दूसरा, बाजार वालें में सरकार की सिरदर्दी कम हो जाती है| सरकार के पास बहाना होता है कि बाजार सरकार के हाथ में थोड़े है| तीसरा, बाजार का एक फैक्टर वैश्विक परिस्थति भी है| विश्व की राजनीती आराजकता से भरी हुई है| कृषि को बाज़ार पर पूरी तरह से छोड़ना ऐसा लगता है जैसे बिना मल्लाह के कश्ती को समुद्र में छोड़ दिया गया हो| चौथा, हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि 2008 के आर्थिक मंदी को कृषि और MGNREGA सफलतापूर्वक इसलिए झेल पाए थे क्युकी वो बाज़ार से परे थे|

अब सवाल उठता है कि क्या किया जाना चाहिए? पहला, बेशक नए बदलाव का परिक्षण होना चाहिए लेकिन उसका शर्त यह है कि उसका बैकअप प्लान भी होनी चाहिए| सरकार कृषि सलाहकार CACP ने पिछले साल सरकार से अनुरोध किया था कि MSP को कानूनन मान्यता दी जाए| यह एक बड़ा चेकपॉइंट हो सकता है| MSP पर उठ रहे शंकाओं पर पूर्ण विराम लागने के लिए काफी है| दूसरा, APMC मंडियों की संख्या बधाई जाए| 41000 डिमांड के मुकाबले 6630 बहुत ही कम है| यह करोना महामारी के चलते घटते रोजगार की चुनौतियों का उत्तर देने में सक्षम है| पंजाब की मंडी व्यवस्था इसका जीता जागता प्रमाण है|

तीसरा, कॉर्पोरेट फार्मिंग तब तक सफल नहीं हो पाएगा जब तक किसान उनके मुताबिक आनाज नहीं पैदा कर पाएंगे| ऐसे में विवाद की सम्भावना बहुत है| किसानों को ख़ास फसलों की ट्रेनिंग और कॉर्पोरेट और किसानों के बीच विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए बिचौलिए के रूप में निष्पक्ष तौर पर काम करना होगा| अगर इसका लिंक पार्टी फण्ड से किसी भी तरह से होता है तो इसमें कोई शक नहीं कि कॉर्पोरेट फार्मिंग ना सिर्फ डिजास्टर साबित होगी बल्कि किसानों के मन में कॉर्पोरेट के प्रति दूरियाँ और बढ़ती चलीं जाएंगी| इस सन्दर्भ में विवादों के निर्णय की भूमिका नौकरशाह के क्षेत्र से कोर्ट के क्षेत्र में स्थानांतर करने की सरकार की इच्छा स्वागत योग्य है|

चौथा, एक उपाए यह भी है जो कि अशोक खेमका जी कह रहे है कि MSP का लाभ सरकार सभी राज्यों को बराबर रूप से बाँट दे और बाकी का काम राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ दे उसे जैसा व्यवस्था अच्छा लगे अपना ले| पांचवां, एक सुझाव यह भी है कि सरकार MSP का लाभ सीधे किसानों के खाते में डाल दे जो भी बाजार भाव और तय MSP के बीच अन्तर है| इसका अपना अलग फायदा है| अगर सरकार के दावें सही है कि बाजारीकरण से किसानों को भाव MSP से भी ज्यादा मिलेंगे तो सही है सरकार के सर से MSP का बोझ बाजार पर शिफ्ट हो जाएगा और किसानों भी अलग गदगद हो जाएँगे|

लेकिन इस सुझाव का शर्त यह है कि सरकार MSP प्रति किसान के बजाए प्रति एकड़ जमीन के मुताबिक दे| क्युकी जिसके पास ज्यादा ज़मीनें है उसे घाटा हो जाएगा| MSP का सम्बन्ध उपज से ना कि किसान के प्रति व्यक्ति लाभ से| ऐसे में PM-KISAN के लिए बनाई गई फाइनेंसियल इंफ्रास्ट्रक्चर काम आ सकती है| लेकिन इस व्यवस्था के दो चुनौतियाँ है जिसे हल किया जा सकता है| पहला, भूमिहीन किसान इस लाभ से वंचित हो जाएँगे| दूसरा, जमीन का वैसा ठोस रिकॉर्ड मौजूद नहीं है| सरकार MSP का एक हिस्सा भूमिहीन किसानों के लिए निकाल सकती है जो कि खाते में दिया जा सकता है| नए होने वाले जनगड़ना के माध्यम से डेटा जुटाया जा सकता है|

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छठा, इस बिल से सरकार कि मंशा यही है कि जो सप्लाई साइड में अवरोध है उसे ध्वस्त किया जाए| जो की सही भी है| लेकिन बाजारीकरण कर पाएगा या नहीं यह कहना मुश्किल है| लेकिन उम्मीद लगाईं जाती है कि बाजार शायद सप्लाई को दुरुस्त कर दे| लेकिन फिर बात वही आ जाती है कि ग्लोबल वर्ल्ड में बाज़ार का संबंध आराजक वैश्विक राजनीती से भी है जिसकी वजह से निरंतर तेल के दामों में उछाल आ रहा है| ऐसे में बाजार से अलावां सप्लाई को दुरुस्त करने का एक और भी तरीका है| सरकार के पास जो आनाज इकठ्ठा हो रहा है उसे सरकार खुद भारत के बाजारों में बेंचे या सरकार अपने पास लेने के बाद बाज़ार के लोगों के हाथों सौपें|

सरकार PSD सिस्टम को यूनिवर्सल कर दे| तब भी आनाज का सप्लाई बढ़ सकता है| लेकिन इसका नेगेटिव साइड यह है कि इससे सरकार के ऊपर आर्थिक भार बढ़ जाएगा| आर्थिक भारत को हल करने के लिए सरकार कृषि उत्पाद को अपने फॉरेन पालिसी का हिस्सा बनाए| अमीर देशों को बेचें और डॉलर कमाए और गरीब देशों को मुफ्त में बांटें जिससे सरकार की विश्व में सॉफ्ट पॉवर पढेगी| फॉरेन पालिसी में अपनी साख बनाने के लिए हम चाइना से वहाँ मुकाबला करना चाहते है जहाँ (इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट) हम कमजोर है और अच्छा खासा डॉलर इन्वेस्ट करते है| कृषि उत्पाद और डॉलर के बीच में बैलेंस बनेगा तो विदेश निति की दिशा में भारत की आर्थिक स्तिथि पर भी बहुत भार नहीं आएगा|

जहाँ तक बात रही किसानों कि तो किसान अपने हठधर्म छोड़े| कोई भी निति स्विच लाइट की भांति बाइनरी (ON or OFF) में नहीं चलती है| यह पंखे के रेगुलेटर की तरह काम करता है| धीरे-धीरे बढ़ता और घटता है| सरकार को शुक्रिया कहना चाहिए कि सरकार उन्हें बारंबार मेज पर बातचीत करने के लिए आमंत्रित कर रही है| उन्हें भी सरकार की आदर करनी चाहिए| हो सकता है कि किसान खेती करने में एक्सपर्ट हो लेकिन यह भी जरूरी नहीं है कि बाज़ार में भी बराबर रूप से एक्सपर्ट होंगे| हरित क्रांति बिना सरकारी इच्छाशक्ति के संभव नहीं हो पाटा| किसानों का हीत राजनीती से दूर होकर सरकार के साथ मिलकर आगे बढ़ने में है| उन्हें अपना अहंकार त्याग देना चाहिए और सरकार के साथ मिलके एक बीच के रास्ते की तरह बढ़नी चाहिए| ऐसा इसलिए क्युकी बातचीत करने से उनकी बातें मानी जा सकती है|

आराजक व्यवहार से सिर्फ सरकार बदल सकती है समस्या का हल नही हो सकता| केंद्र में सरकार लिबरल पार्टियों की नहीं है| ऐसी सरकारें अपने ठोस फैसलों के लिए जाने जाते है| ये सरकार मार्गरेट थैचर की केटेगरी की है जो नए उदारवादी फैसलों के बाद ब्रिटेन के तमाम विरोधों को सफलतापूर्वक झेलने का इतिहास है| दूसरी ओर, लिबरल पार्टी का इतिहास यह है कि अन्ना आन्दोलन 2011 को नहीं झेल पाई थी| जबकी भ्रष्टाचार तो ऐसा विषय है कि प्राचीन ज़माने से चलता आ रहा है और यह मानवीय प्रकृति का हिस्सा है जो अपनी क्षमता से अधिक पाने की लालसा में हमेशा रहता है|

Footnotes

  1. The Indian Express | Challenges to farm bills harken to socialist era, attempt to undo agriculture’s 1991 moment
  2. Down to Earth | Why Punjab stands to lose from farmers’ produce trade and commerce ordinance
  3. Business Standard | Lalu attacks Nitish over remark linking coastal areas to industries
  4. The Indian Express | Agri reforms to take away big share of Punjab revenue from mandis
  5. Down to Earth | 6 reasons why India has failed to solve the riddle of agriculture marketing
  6. NDTV | Ashoka Khemka suggestions on farm acts
  7. Business Lines | Call for universalisation of PDS gets louder
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3 thoughts on “नई कृषि बाज़ार व्यवस्था: किसान, सियासत और हकीकत”

  1. आज मैंने अच्छे से पढ़ है भाई बहुत मस्त लिखा है। अगर निष्कर्ष निकाले तो आपको नही लगता सरकार किसानों की समस्याओं का खुद समाधान करने की बजाए उसको उद्योपतियों के हाथों मेबदेकर अपना पलड़ा झाड़ रही है क्योंकि आपने जो कहा मंडियों का विकास होना चाहिए और इस बिल से मंडियों का विकास करना कोई जरूरी नही है । हां ये बात तय है कि किसान आंदोलन में जो पार्टीयां है वो किसानों के हित के लिए कम और BJP का नाम खराब करने के लिए काम कर रही है उन को कोई मतलब नही है किसान आंदोलन से।
    बाकी इसका हल बातचीत से ही निकलेगा हठ से नही निकलेगा।

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