भारतीय रेलवे में सामूहिक सुधार की जरूरत

भारतीय रेल एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है| भारतीय रेल का कभी भी मकसद मुनाफा नहीं रहा है| इसे लोगों की सेवा के मकसद से बनाया गया था| भारतीय रेल एकमात्र ऐसी संस्था है जिसकी टिकट हमेशा सेवा से बहुत पहले ही बुक हो जाता है| शायद ही कभी ऐसा हो कि ट्रेन को खाली जाना पड़े| भारतीय रेलवे, लोगों के लिए परिवहन का एक मुख्य संघटक रहा है| इसकी पहुच इतनी गहरी है कि समाज के हर तबके को छूते हुए पूरे देश पर अपनी पकड़ बनाए हुए है|

लेकिन फिर भी लोगों को लगता है कि भारतीय रेलवे को बिजनेस मॉडल का प्रतिरूप दिए बगैर इसका विकास बहुत कठिन है| एक और ज्वलंत सवाल उठता रहा है कि आखिर कैसा कैलकुलेशन होता होगा कि सारे टिकट बिक जाने के बाद भी बहुत बड़े पैमाने पर घाटा ही होता है| ना सिर्फ टिकट बल्कि इसके अलावां तत्काल टिकट का अतरिक्त पैसा, प्रीमियम तत्काल का अतरिक्त पैसा, डायनामिक फेयर का अतरिक्त पैसा, जितने टेंडर्स दिए जाते है रसोई से लेकर बुक स्टाल तक उसका पैसा आदि भी इसके धन श्रोत में शामिल रहा है|

देश की जनता इस आस में आज भी बैठी है कि भारतीय रेलवे का विकास हो, जिसके लिए पहले 14% किराया बढाया गया था, फिर प्रीमियम तत्काल जैसी चीजें लागू की गई थी और उसके बाद डायनामिक फेयर जैसा लोचा लगाया गया था| लेकिन उसके बाद से लेकर मैंने आज तक जितनी बार सफ़र किया है उसमे मुझे कुछ ख़ास बदलाव नहीं दिखा है| इस बार के सफ़र वाली ट्रेन, केरला एक्सप्रेस के जिस डब्बे में था, यहाँ तक कि उसमे चार्जिंग सॉकेट भी नहीं था|

वॉल्वो बस का किराया लगभग इतना ही है इसके बावजूद सारे स्टेट का टोल टैक्स भरते हुए लोगों को रेलवे के अपेक्षाकृत कम समय में गंतव्य स्थान पर पहुचाने में सफल है| नोट करने वाली बात यह है कि वॉल्वो बस को मुनाफा भी होता है, नहीं तो वाजिब सी बात है कि अगर ऐसा नहीं होता तो अपनी बस सेवा क्यों जारी रखता| वॉल्वो बस का किराया रेल के जनरल फेयर के बराबर ही होता है ना कि डायनामिक फेयर| ऊपर से वाईफाई की सेवा अलग से मिलता है| आखिर ऐसा क्या है जिसकी वजह से पूरा तंत्र और सुरक्षा होने के बावजूद भी रेलवे लाचार है और अपनी असफलता की कहानियां खुद सुनाती है जिसका अंत राजनितिक मुद्दा बनकर होता है|

मेरे समझ से इस असफलता का एकमात्र कारण है तंत्र का सुनियोजित ढंग से ना चलना| अब इसके ना चलने के पीछे बहुत सारे कारण हो सकते है| इसके लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों सामान रूप से जिम्मेदार है क्युकी अटल जी के समय बीजेपी की भी बारी आई थी जिसमे रेलवे के लिए कुछ ख़ास नहीं हो पाया था| उसका पहला कारण यह है कि रेलवे ने समय के साथ संवाद नहीं किया| एकबार मै बहुत पहले अल्टरनेटिव फ्यूल के बारे में पढ़ रहा था तो पाया कि जेट्रोपा पौधा से बना फ्यूल पर भारतीय रेल ने 2002 में सफलता पूर्वक परिक्षण किया था| लेकिन उसके बाद वो राजनितिक कारण की वजह से विश्वास में नहीं आ पाया|

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तकनिकी रूप से मंजूरी मिल गई और उस उर्जा से हमारा रेलवे चलने में सक्षम था लेकिन हमारी राजनीती ने समय के साथ तकनिकी बदलाव को नहीं स्वीकारा| हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने इस पौधे की खूब वकालत की थी| इस उर्जा में वो ताकत है जो हमें स्वालंबी बना सकती है| उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था कि लगभा 600,000 वर्ग किलोमीटर बंजर भूमि है जिसमे 300,000 वर्ग किलोमीटर की भूमि इस पौधे के काम आ सकती है|

इस पौधे की ख़ास बात यह है कि बंजर जमीन पर भी उगने में सक्षम है| इसके अलावां बाकी के फसलों के अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत होती है| अगर इसकी क्षमता को पहचाना जाए तो कई समस्याओं को हल कर सकता है| जो किसान बंजर क्षेत्र में आते है, अगर उन किसानो को तकनीकी सलाह दी जाए और बैंक की तरफ से आर्थिक मदद दी जाए तो वो आत्महत्या भी नहीं करेंगे और सरकार की वित्तीय घाटा भी कम करने में सहायता मिलेगा जो क्रूड आयल के आयत से पैदा होता है| सबसे अच्छी बात यह होगी कि किसान कर्ज लौटने में भी सक्षम होंगे| इसके अलावां इससे जो इंधन बनेगा वो वातावरण के लिए अपेक्षाकृत कम नुकसानदेही होगा|

इसके कुछ चुनौतियाँ भी है जैसे यह पौधा बहुत जहरीला होता है इसलिए इसको सतर्कता से उगाना होगा| ये ऐसी चीजें है जिसका हल निकाला जा सकता है| अन्यथा अगर इन पौधों का पानी जलाशय में जाता है तो पानी वाले जीव जंतु खतरे में पड़ सकते है| इस जहरीलेपन का एंटीडोट आदि का शोध करके कोयले और पेट्रोलियम पर से निर्भरता ख़त्म की जा सकती है| अब शैवाल(Algae) फ्यूल से उर्जा बनाने पर लगातार दिन दुगनी और रात चौगनी रिसर्च हो रहा है और पपेर पब्लिश हो रहे है| ये तो बहुत दूर की बात है अब तक हम जेट्रोपा के पोटेंशियल को पहचानने में ही असफल रहे है| जिस वैकल्पिक क्रांति की उम्मीद थी उससे ओझल रहे है|  शैवाल उत्पन्न करने का भौगोलिक वातावरण भी भारत में सबसे जबरजस्त है लेकिन प्रशासनिक रूकावट लाचारगी बयाँ करती रही है|

आज भी ट्रेन उस बिजली पर चलता है जिसके लिए कोयला ऑस्ट्रेलिया से आयात होता है| पहली बात की आयात से खुद कोयला महंगा, फिर से प्रोसेसिंग होगा तो उससे बनने वाली बिजली कितनी महँगी होगी इसका अंदाजा आप खुद ही लगा ले| हमारे देश में जो बिलजी बनती है उसमे से कोयले से 58.6%, नेचुरल गैस से 11.08%, सोलर से 2.7%, नुक्लेअर से 1.9%, विंड से 9.1%, डीजल से 0.3% का योगदान है| यहाँ पर सीधा सवाल यह उठता है कि जब कोई वैकल्पिक इंधन सफलता पूर्वक परिक्षण हो चूका है तो आखिर क्यों हम अपने खजाने को आयात करने में लुटा रहे है जिसका भरपाई करने के लिए जनता की जेब काटते है|

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इसी खजाने को भरने के लिए जितनी भी आवश्यक सब्सिडी दी जाती थी उसको देशप्रेम और आत्मनिर्भरता की दुहाई देकर काटते जा रहे है| भारतीय रेलवे को एक रिफार्म की जरूरत है| उस बदलाव का यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि अगर ट्रेन में कुछ दिनों के लिए वाईफाई लगा दे| दो नया डिब्बा बनाके फोटो खिचवाके सोशल मीडिया पर वायरल कर दे| सामूहिक रूप से रेलवे में बदलाव की जरूरत है|

इसके अलावां प्रशासनिक बदलाव भी उतने ही महत्वपूर्ण है| भारतीय रेलवे देश में MPs और MLAs को आरक्षण देती है ताकी ये महत्वपूर्ण लोग समय पर पहुच सके| लोगों की सीटें रोककर रखी जाती है जिससे अगले दिन यात्रा करने वाले नेता जी को कोई दिक्कत नहीं आए| यही टिकट आम आदमी को महीने भर पहले भी नहीं मिल पाता है| नेता जी और उनके पी.ए. आज इसको एक बिज़नस बना चुके है| प्रत्येक टिकेट को कुछ रूपए की कमीशन पर टिकटों को बेचते है जिसे हम ब्रोकर कहते है| आखिर यह लूपहोल कब बंद होगा? नेताजी प्रतिदिन अपने पूरे परिवार को लेकर यात्रा करते है क्या? इसकी जांच हो तो सब सामने आ जाएगा|

लेकिन इसके प्रति कोई प्रतिबधता ही नहीं है और नहीं कोई जवाबदेही| इसके अलावां रेलवे स्टेशन पर प्रचार आदि चीजों के लिए भी कंपनियों का स्वागत करना चाहिए| कुछ ऐसे डील हो जिससे रेलवे स्टेशन हमेशा कंपनियों के लिए प्रचार प्रसार का माध्यम बनता रहे| प्रशासनिक और राजनीतीक कारण बताने का यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि हमारी टेक्नोलॉजी जाबर है और इसका रोड़ा हमेशा राजनीती ही बनता है| हमें रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर पैसे खर्च करने होंगे| युवाओं को रिसर्च के प्रोत्साहित करना होगा उन्हें संसाधनों की उपलब्धता करवानी पड़ेगी|

जापान की पूरी ट्रेन की जितनी वजन होती है उतना वजन सिर्फ भारतीय रेल का इंजन का होता है| आज भी पूरा का पूरा कास्ट आयरन से बना हुआ है जबकी मटेरियल में कितना विकास हो चूका है| इसका प्रमाण हमें मारुती सुजुकी से मिलता है| एक साल पहले मारुती स्विफ्ट को बाजार में उतारकर धूम मचाती है और उसके ठीक एक साल बाद मटेरियल टेक्नोलॉजी का उपयोग करने उससे हलकी गाडी बलेनो को बाजार में उतारकर धूम मचा रही है| जबकि इंजन से लेकर ऑलमोस्ट चीजें वही है जो स्विफ्ट में थी लेकिन मटेरियल तकनीक का उपयोग करने की वजह से गाडी का फ्यूल एफिशिएंसी भी बढ़ा और लोगों को नया एक्सपीरियंस भी|

लेकिन अगर रेलवे को निहारे तो पाएंगे कि अगर आज भी नई ट्रेन बनानी हो तो उसी कास्ट आयरन से बनाएगे जैसे सदियों से बनता आ रहा है| स्वाभाविक सी बात है जो मशीन जितनी भारी होगी उतना ही फ्यूल मांगेगी| उसके अलावां आज भी ट्रेन का स्ट्रक्चर वैसा ही है जैसा पुराने ज़माने में हुआ करता था एकदम फ्लैट| जो कि फ्यूल की बर्बादी है| जापानी ट्रेन मछली की तरह इसलिए नहीं दिखती कि वो जापानी है बल्कि उसके पीछे तकनिकी कारण भी है|

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अब आते है कि आम आदमी की रेलवे विकास में क्या भूमिका हो सकती है| आम आदमी की भूमिका को कैसे सामने लाया जा सकता है| हमेशा से रेलवे में इन्वेस्टमेंट को लेकर संकट रहा है| इसके लिए कभी कभी प्राइवेटाइजेशन को माध्यम के रूप में लाने की भी बातें की गई| लेकिन मेरे समझ से रेलवे में निवेश की समस्या को पब्लिक की सहभागिता से ख़त्म कर सकते है| यह भी सच्चाई है कि बिज़नसमैन बाहर से निवेश कर इसके विकास में मदद करने के प्रति अनिक्छुक रहते है| लोकतंत्र में ऐसी संस्था जो परिचालन की रीढ़ हो उसे प्राइवेट कम्पनी के हाथ में सौपना भी खतरनाक होगा| ऐसे में एक ही आप्शन बचता है कि लोग अपनी भी भागीदारी सुनिश्चित करे|

इसके लिए बैंक को माध्यम बनाया जा सकता है| अगर लगता है कि बैंक का कमीशन ज्यादा लगेगा ऐसे सूरत में इसके लिए एक स्वतंत्र संस्था का निर्माण करना ही ज्यादा उचित रहेगा जो इसके फाइनेंसियल मामलों की देखरेख कर सके| लोग अपना पैसा जमा करे और फाइनेंसियल संस्था जमा किए हुए लोगों के पैसों का ब्याज तय करे जो लोगों को वापस मिलेगा| लोग अगर इधर अपना पैसा फिक्स करते है तो उन्हें बैंक के मुकाबले ज्यादा ब्याज मिले जिससे लोग उत्साहित हो इधर निवेश करने के लिए| इस तरह से आम आदमी भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करके रेलवे की विकास में मदद कर सकता है|

इसलिए रेलवे को सम्पूर्ण बदलाव की जरूरत है जिसके लिए सही और सच्ची मंसा की जरूरत है| रेलवे में जिस बदलाव की बातें नेताजी करते है वो महज उनका चुनावी इंटरेस्ट होता है| फ्री की वाई फाई और नए ट्रेन के डिब्बे का फोटो सोशल मीडिया में डालने से विकास नहीं होगा| विकास होगा जब इसमें कलेक्टिव रिफार्म लिया जाएगा| हमारी रेलवे ऐसे बदलाव करने में सक्षम है| क्युकी भारतीय रेलवे को ना तो सुरक्षा की चिंता है और नाही संसाधन की, बस कमी है एक सच्ची मंशा की|

नोट :- ये आर्टिकल अख़बार छात्र संसद में छप चुका है|

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