भारत-पाक रिश्ते की खटास का दोषी एक नहीं दोनों है

जब भी भारत पाक की बातें होती है तो अक्सर हमारे देश इस बात की जिक्र होती है कि इन दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते अच्छे नहीं होने का मुख्य कारण दक्षिणपंथी समूह है| अभी भी यह कहा और समझा जाता है| दो ताजा राजनितिक उदहारण है जो इस बात की पुष्टि करते है| पहला है बिहार चुनाव के और दूसरा गुजरात चुनाव के चुनावी भाषण| लेकिन मै समझता हूँ यहाँ इसकी अध्ययन में थोड़ी बेईमानी हो रही है| एक सत्य यह भी है भारत का तथाकथित अल्ट्रा लिबरल पक्ष भी उतना ही जिम्मेदार है जितना कि घोर दक्षिणपंथी समूह| दो तिन दिन पहले मै पाकिस्तान का मशहूर अख़बार ‘डौन’ को पढ़ रहा था| उसके ओपिनियन वाले हिस्से में एक लेख लिखा गया था| लेख का टाइटल था “Bharatmata’s unequal children”| लेखक का नाम तो नहीं दिया गया था लेकिन फोटो लगाकर उसके डिस्क्रिपसन में दिल्ली स्तिथ पत्रकार करके लिखा हुआ था| पूरा लेख पढ़ के मुझे यही लगा कि ये लोग (घोर वामपंथी) भी उतने ही जिम्मेदार है क्युकी बहुत सारी बातें मनगढ़ंत थी|

पहले ही वाकया में लिखती है कि नए भारत को असहिष्णुता का ऑफिसियल सैंक्सन मिला हुआ है| लिखने की शैली ही ऐसी है कि पाकिस्तान की आने वाली नौजवान पीढ़ी के जहन में नफरत भरना शुरू कर दे| जो लोग अनपढ़ और गरीब है उन्हें इन चीजों से बहुत ज्यादा सरोकार नहीं रह जाता है| सबसे ज्यादा पढा-लिखा मिडिल क्लास के लोग जो अक्सर अख़बार पढ़ते है उनके दिमाग में जहर भरने की कोशिशें की जाती है| सोचिए भारत के लेखक का लेख पाकिस्तान के मशहूर अखबार का एडिटोरियल का हिस्सा बन पाता है लेकिन वहीं पाकिस्तान के पूर्व एयर मार्शल ‘अशगर खान’ जो भारत पाकिस्तान की लड़ाई के उचित दोषी को एक्सपोज करते है उन्हें कोई पाकिस्तान में पूछता तक नहीं| यु-ट्यूब पर मौजूद इंटरव्यू में वो इस बात को कहते है कि कई बार लेखें लिखा है उन्होंने लेकिन कोई छापता ही नहीं है| भारत से भी अगर वैसे लेख जाए जो अच्छा हो और अमन चैन की बातें करे तो शायद नहीं छापे| लेकिन वही भारत का कोई लेखक भारत को खूब कोसे वो भी उन मुद्दों पर जिसपर पाकिस्तान की नीव पड़ी हो तो उन्हें अच्छा तो लागेला ही|

इनके लेख में भारत की एक ऐसी चित्र बनाने की कोशिश की है जैसे मानों भारत में मुसलमानों से साथ यूरोप के Jews जैसा व्यवहार किया जाता है| जो की सरासर झूठ और असत्य है| इस लेख में पहले मॉडल के तौर पर उन्होंने आदित्य योगीनाथ को पेश किया है जिसमें वो बताती है कि योगीनाथ सार्वजनिक रूप से धर्मनिरपेक्षता को तार-तार करते रहे है| ये सवाल आदित्य योगीनाथ से भी बारंबार पूछा गया है जिसमे उनका जवाब यही रहा है कि वो तुष्टिकरण के खिलाफ है ना कि धर्मनिरपेक्षता के| कहीं न कहीं ‘तुष्टिकरण’ शब्द को ‘धर्मनिरपेक्षता’ के विपक्ष में लाकर खड़े करने की कोशिश की है जिससे वो लोगों की भावनाओं को और ज्यादा उकेर सके|

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आगे लिखती है कि भारत में मुसलमानों के खिलाफ उनके पहनावे-ओढ़ावे, खानपान और काम धाम को लेकर जुल्म और हिंसाएँ की जाती है| इस कथन में मुझे कहीं भी सच्चाई नजर नहीं आ रही है| मैंने ऐसे इंसिडेंट नहीं सुने जिसमें किसी मुसलमान के पहनावे की वजह से हिंसा की गई हो| रही बात खान-पान की तो अफवाहों के आधार पर “कुछ” फ्रिंज एलिमेंट ने घटिया हरकतें जरूर की थी| उन कुछ एक गिने चुने घटनाओं को पूरी देश के मूड के तौर पर पेश करने का लॉजिक चिंता का विषय है| यह बात तब सही रूप से कही जाती अगर सरकार की तरफ कोई ऐसे कानून बनाएँ गए हो और अधिकारिक तौर पर राजनितिक संवर्धन के साथ किया जा रहा हो| इसलिए कुछ एक गिने चुने घटनाओं को पूरे देश की तरफ से इसे पीरियाडिक साबित करना किसी भी एंगल से जायज नहीं है| ये चीजों आपसी द्वेषों की हवा देंगी| मै ऐसा बिलकुल नहीं कह रहा कि गलत चीजों को लिखा नहीं जा सकता लेकिन एकतरफा और साजिश के साथ पेश करना सच में दूरियां और बढ़ाएगा| मै ऐसा इसलिए कह रहा हु क्युकी मै अक्सर काफी लम्बे समय से इस अख़बार को पढता हु लेकिन वैसे लेख भारत की तरफ से लेखन के द्वारा ऐसा नहीं देखा जो सकारात्मक लिखें हो|

मैंने अब तक जितनी भी राइटिंग पढ़ा है उसमे एक चीज कॉमन पाया है कि धार्मिक भेदभाव की बातों में ‘दलित’ को घसीट कर जरूर ले आते है| क्युकी अगले लाइन में ये भी उसी श्रृंखला की कड़ी बनती है| यूरोप के नाजीवाद के साथ तुलना करके दलित के साथ हो रहे भेदभाव को बताने की कोशिश कर रही है| “छुआ-छूत” का कांसेप्ट कब का लुप्त हो गया लेकिन संवेदना हासिल करने के लिए आज भी इसका भरपूर उपयोग होता है| लिखने का ढंग ऐसा था मानों आज भी इस देश में सारे दलितों के साथ अत्याचार किया जाता है| आगे लिखती है कि दिन में मुसलमानों की हत्या कर दी जाती है, विडियो बनाया जाता है और सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया जाता है| इसके अलावां वो आरोप लगाती है कि सोशल मीडिया पर असंसदीय भाषा के सहारे बहुसंख्यक लोगों द्वारा इसका जश्न मनाया जाता है| ऐसे चीजें तब होती है जब कम्युनल क्लैश होता है| उस समय दोनों समूह यही चीजें करते है| लेकिन जनरल इंसिडेंट जो हुआ है जिसमे डेरी के किसान का मर्डर हुआ था वो कमजोर प्रशासन की बातें है| ऐसे कुछ एक घटनाओं को उठाकर पूरे देश को एक ब्रश के पेंट करना उचित नहीं है|

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जहाँ तक बात रही सोशल मीडिया में विडियो बना पोस्ट करने की बात तो यह डिजिटल विकास का एक नकारात्मक पहलु है जो हर केस में होता है| ऐसा बिलकुल नहीं है कि ऐसी जश्न वाली चीजें सिर्फ उसी घटना पर होती है| लोगो को भड़काने के लिए सेलेक्टिवेली उपयोग करना है तो उसकी अलग बात है| क्युकी कश्मीर में जब ड्यूटी पर तैनात सैनिक के साथ अमानवीय व्यवहार होता है तब भी विडियो बनाया जाता है और उसका जश्न मनाया जाता है| आगे की लाइन में लिखती है कि असम में नब्बे हजार मुस्लिमों को अवैध शरणार्थी बना दिया गया है और दो हजार को डिटेंशन कैंप में बंद कर दिया गया है| पढने पर ऐसा लगता है कि भारत कितना क्रूर देश है| लेकिन यह सच नहीं है| पढने के बाद लगता है जैसे इसी सरकार में हुआ है लेकिन यह भी मेंशन करना चाहिए कि आजादी के बाद से लेकर आज तक कुल नब्बे हजार को अवैध शरणार्थी घोषित किया है| बांग्लादेश बनने के समय बहुत सारे ऐसे शरणार्थी जो वापस गए ही नहीं जबकी यह वादा किया गया था ये लोग अपने मुल्क वापस जाएंगे ऐसे में वैधिक रूप से सिटीजनशिप कैसे दिया जा सकता है?

ऐसे-ऐसे अंग्रेजी लब्जों का उपयोग किया गया है जैसे मानो भारत में मुस्लिम और दलित बेचारगी का जिंदगी जी रहे है| दलित वर्ग को तो जबरजस्ती जोड़कर अपनी बात को प्रभावी बनाने की कोशिश की जाती है| बड़ी मुर्खापुर्वक धीरे धीरे डिस्कोर्स को बदलकर आज के भारत से गोलवालकर के पास ले जाती है| मोहतर्मा बात “जिम्मी” की कांसेप्ट की करती है जो की आरएसएस का आईडिया रहा था| मेरा एक सीधा सवाल यह है कि क्या सावरकर की उन बातों को संविधान ने अपनाया? जब नहीं अपनाया तो क्यों जबरजस्ती भारत के मुस्लिम को सेकंड क्लास नहीं होने के बावजूद भी सेकंड क्लास सिटीजन प्रूफ करने में लगी है? संविधान ने जब समानता सुनिश्चित की है तो फिर गोलवालकर की कहानी को दोहराने का क्या मतलब है? एक पैटर्न रहा है कि भारत के राईट विंग को कोसने के के लिए आरएसएस की पैदाईसी, बाबरी विध्वंस, जिम्मी की थ्योरी, माइनॉरिटी के साथ भेदभाव और शरणार्थी को नागरिकता नहीं देने जैसे मुद्दों पर बातें नहीं हो तब तक लेख कम्पलीट होता ही नहीं है|

उसके बाद ‘मध्यकालीन’ जैसे विश्लेषण का उपयोग करके बाबरी मस्जिद की बातें करती है| कहतीं है कि ये हिन्दू सुप्रीमसी का पहला मास मूवमेंट था| मै उन चीजों के बारे में बिलकुल नहीं कहूँगा कि पाकिस्तान में उसका क्या रिएक्शन हुआ था| जानती तो वो भी होंगी लेकिन सेलेक्टिव लेख लिखने के कारण उन चीजों के स्पेस नहीं दे पाई| जिस देश के मुख्य अखबार के लिखा जा रहा हो तो कम-से-कम कुछ बातें कर लेनी चाहिए थी| लेख में एक जगह तो बहुत शातिर तरीके से कोर्ट के वर्डिक्ट को भी अवैध साबित करने की कोशिश की है जिसमें वो कहतीं है कि आफ्टरआल जज भी इन्सान ही होता है| पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयानों और पुणे के उदहारण से इसकी पुष्टि करने की कोशिश करती है| कुल मिलाके कह सकता है एक अच्छा ख़ासा भड़काऊ लेख था जो वहाँ के लोगों में भारत के प्रति गुस्सा फुक-फुक के भर दे|

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लेखन के भी अलग-अलग पहलु है| एक ही विषय पर अलग अलग तरह से लेख को पेश किया जा सकता है जो जनभावना को एकदम अलग प्लेटफार्म पर लाकर खड़ा कर दे| कलम की ताकत इतनी है कि या तो कभी क्रन्तिकारी परिवर्तन के मजबूर कर देता या कभी खतरनाक भी साबित होता है| देश में आजादी के समय लेखन, कविताओं ने एक बड़े जन सैलाब को आकर्षित किया था एकजुट होने के लिए| ऐसे ही बांग्लादेश की आजादी के समय वहाँ के कॉलेज के प्रोफेसर और छात्र के लेखनों के औरतों की भागीदारी और भी बढ़ा थी जिससे ‘मुक्ति वाहिनी’ को बहुत बड़ा बल मिला था| ये सब सकारात्मक प्रभाव है| लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव यह सामने है जो अभी हो रहा है| उदहारण के तौर पर ये लेख को ‘डौन’ अखबार में छपा है| दोनों मुल्कों की जनभावना से दक्षिणपंथ और वामपंथ दोनों की दुकानें चलती है| अगर अमन आ जाएगी और शांति हो जाएगी तो फिर दक्षिणपंथी लोग किसका डर दिखाएँगे|

वही दूसरी ओर वामपंथ को इस बात की चिंता रहती है वो लोगों को ‘इमोशनल’ कैसे करेंगे? वामपंथी लोगो  के लिए दूसरी वजह यह है कि यह विचार आज पूरी दुनिया में अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है| इनके पास हल कम होते है और क्रिटिसिज्म ज्यादा| ये तथाकथित नए विचार वाले वामपंथी लोग है| पूरा वामपंथ की अस्तित्व कब की ख़त्म हो गई जिसके पुजारी भगत सिंह जैसे लोग रहे थे| अब जो बची है वो कीर्तन मंडली है जो आए दिन कीर्तन करते रहते है….

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