‘फतह का फ़तवा’ धार्मिक संवाद का एक माध्यम

मै कल हिंदी लिटरेरी एसोसिएशन के एक इवेंट में दर्शक के रूप में गया था| उस इवेंट में दो अलग-अलग टॉपिक्स थे जो अलग-अलग जगहों पर चर्चा की जा रही थी| पहला था ‘आर्टिकल 370’ और दूसरा था ‘यूनिफार्म सिविल कोड’| दोनों विषय मजेदार थे जो एक संविधान और एक कानून की बातें करते है| दोनों इवेंट को एक साथ होने की वजह से मुझे थोडा-थोडा सा ही आनंद लेने मौका मिला| मैंने जब इस युवाओं को इस पर बातें करते देखा तो मुझे एह बात की एहसास हुई कि ये जो जनरेशन है वो पूरी उर्जा से संवाद करना चाहता है| तब सवाल उठता यह है कि आखिर वो कौन लोग है जो इनकी संवादों को अवरोधित करते है? ऐसे लोग हर धर्म, हर समाज और हर तबके में है| कोई भी वर्ग अछूता नहीं है| हर बातें समाज के सामने संवाद के लिए लानी चाहिए, चाहे बात औरतों के मुद्दों को लेकर हो या फिर किसी भी धर्म के धार्मिक मुद्दों को लेकर| अभी कुछ दिन पहले तारेक फतह साहब ने ‘फतह का फ़तवा’ नाम से एक ऐसी चर्चा की शुरुआत की है जिसपर पहले कभी पब्लिक में चर्चा नहीं हुई| मस्जिद के डिस्कशन वही सीमित रह जाता था|

मैंने यू ट्यूब के माध्यम से उनके कुछ एपिसोड देखा है| उस में मेहमान के रूप में आए मौलवी और मुस्लिम एक्सट्रीमीटीज लोगों की बौखलाहट से अंदाजा लग गया था कि वो तबका संवाद से कितना नाखुश है| इस प्रोग्राम को बंद करवाने के लिए ‘गरीब नवाज फाउंडेशन’ द्वारा हाई कोर्ट में याचिका तक दायर कर दी गई| इस फाउंडेशन के नाम से आप इसका अंदाजा बिल्कुल नहीं लगाइए कि वो गरीबो की आवाजें थी|

बल्कि उन एक्सट्रीमीटीज की आवाजें थी जो अपना दबदबा बना कर इस समाज की बागडोर अपने हाथ में रखना चाहते है| कोर्ट के माध्यम से अपनी बातें रखने का सबको हक़ है इसमें मुझे कोई एहतराज नहीं है| मुझे ऐतराज उस चीज से है जिस चीज पर संवाद से भागते है| आप किसी के साथ चर्चा कर रहे है और चर्चा के दौरान सामने वाला आप पर व्यक्तिगत परिवार को लेकर हमला करने लगे और तमाम तरह की धमकियाँ देना शुरू कर दे तो आपको यह समझना चाहिए कि आपका बिंदु ना सिर्फ सही बल्कि बहुत शार्प और तार्किक है|

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तारेक फतह साहब ने इस प्रोग्राम को लेकर सर्वे भी करवाया| जिसमें औरतें अपनी बात इस शर्त पर रखने के लिए तैयार हुई कि उसकी आइडेंटिटी पब्लिक नहीं की जाएगी| इसके बाद इसके लिए उन्होंने एक प्रोग्राम भी रखा जिसमे इस बात पर चर्चा की जा सके कि इस प्रोग्राम में क्या गलत है| उस प्रोग्राम की दो चार बातें बताता हु जो इस चीज का बयाँ कर रहा है कि धार्मिक ठेकेदार कितने बौखलाए हुए है| पहली बात तो यह कि जब तारेक फतह ने एक मेहमान से यह पूछा कि क्या इसे बंद किया जाना चाहिए?

जवाब यह मिलता है कि आप अपनी बेटी को क्यों नहीं देखते वो गैर-मुस्लिम लड़के के साथ बिना शादी के रह रही है| टीवी डिबेट उन लोगों द्वारा ऐसी बातें करना जो मुस्लिम समाज को आइना दिखाते है कितना जायज है इसका अंदाजा आप खुद लगाइए| सवाल का जवाब नहीं होने पर व्यक्तिगत हमला बौखलाहट के अलावां कुछ नहीं है|

उस डिबेट में एक JNU की मुस्लिम रिसर्च स्कॉलर भी थी| उस लड़की ने कुछ नहीं कहा था बस इतना कहा कि बातें हमेशा पब्लिक में होनी चाहिए| ऐसे में एक सज्जन का जवाब मिला कि 10 तो है नहीं पीछे खड़े और बात करने चली मौलवियों की| मेरा सवाल यह है क्या बातें करने के लिए 10 लोग पीछे खड़े होने चाहिए तभी व्यक्ति बाते करने के लिए सर्टिफाइड होगा? एक मौलवी साहब ने प्रोग्राम के नाम पर एतराज जताते हुए कहा कि “फ़तवा लगाने का अधिकार तो हमारे पास है इनको किसने दिया?” ये सब वो चीजें है जो वर्षों से मस्जिद के दीवारों के बीच दफ़न होती रही है| किसी भी लोकतान्त्रिक देश में फतवे का क्यों जगह होनी चाहिए?

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न्याय कोर्ट करेगा, नोटिस सरकारें निकालेंगी तो इसका जगह ही कहाँ बचता है| उन साहब की बातों से ही लग रहा है कि वो खुद भी अपने आप को ठेकेदार मानते है और संवाद से इसलिए डरते है या बौखला जाते है जिससे उनकी हुकूमत न चली जाए| उस प्रोग्राम में एक पढ़े लिखे सज्जन भी बैठे थे उनकी एक बात मुझे बहुत पसंद आई| उनका मानना था कि यह हमारी मीडिया की भी गलती है कि जब भी ऐसी चीजों के बारें में चर्चा होती है तो मौलवी से शुरू होकर वही ख़त्म क्यों हो जाती है| उनके जैसे पढ़े-लिखे लोगों और छात्रों को मौका क्यों नहीं देते|

21वीं सदी में जब कोई सामने आकर बातें करने के लिए एक प्लेटफार्म रखता है तो सामने टीवी पर आकर पुरे मुल्क के सामने यह कहते है कि वो जूते मारकर भगाएँगे| कोलकाता के एक मौलवी साहब गर्दन कटाने तक की बातें कर जाते है, वो भी उस समय जब हमारे जैसा नौजवान कैपिटल पनिशमेंट के खिलाफ आर्टिकल लिखता है और बातें करता है| जिस समूह ने कोर्ट में याचिका दायर की है उनका तर्क यह है कि इससे हिन्दू-मुस्लिम में दंगा भड़क सकता है|

इनका मतलब साफ है कि अगर यह प्रोग्राम बंद नहीं होता है तो वो दंगे कराकर अपनी बातें साबित कर सकते है| दुसरे शब्दों में कहे तो वो धमकियाँ दे रहे है| आखिर सवाल ठेकेदारी की जो है| जब औरतों को लेकर बातें करते है एक मेहमान यह भी कहते कि लड़कियां कुस्ती के लिए थोड़ी न बनी है| जब बुर्के पर बाते करते है तो सामने से जवाब यही मिलता है कि हमारी लड़कियां आधे-अधूरे कपडे पहनकर बाजारों में नहीं घुमती है इससे वो खुश है| जब यही बातें हिन्दू धर्म का कोई कहता है तो वो कम्युनल और औरत विरोधी होता है तो ये भी तो सेक्युलर और औरत प्रेमी नहीं है न|

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बातें सबपर समान रूप से लागु होती है| अगर उनका विरोध होता है तो ऐसे चंद लोगों का भी विरोध होना चाहिए जो भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में भी एक समाज को धर्म के नाम पर कैद कर रखा है| जिस तरह से चंद उद्योगपतियों ने पूरे इकॉनमी पर अपना कब्ज़ा जमाया हुआ है ठीक उसी तरह से भारत में कुछ चंद मुस्लिम एक्सट्रीमीटीज लोगों ने पूरे मुस्लिम समाज पर कब्ज़ा जमाया हुआ है| यह ठेकेदारी सिर्फ सामाजिक संवाद और जागरूकता से ही ख़त्म की जा सकती है जिसका माध्यम ऐसे टीवी प्रोग्राम बिल्कुल हो सकते है|

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