‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की सीमा कैसे तय हो ?

अगर सैवधानिक लब्जों में कहा जाए तो किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” कहलाती है| 21वीं शताब्दी में हमारे संविधान के अगर किसी शब्द का सबसे बड़ा मजाक उड़ाया गया है तो वो है ‘धर्मनिरपेक्षता’, ‘राष्ट्रवाद’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’| भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘राष्ट्रवाद’ एक गर्व करने वाला शब्द होना चाहिए था| लेकिन आज महज अपशब्द बनकर रह गया है| ठीक ऐसे ही ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ जैसे शब्दों का भी ऐसे ही उपहास उड़ाया गया है| कुछ भी कह देने और बाद में उसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ देने का एक नया चलन शुरू हुआ है| अब सवाल यही है कि क्या इसकी कोई सीमा भी बांधी जानी चाहिए और रचनात्मक आलोचना और अपमान के बीच कोई लकीर होनी चाहिए? मुझे ऐसा लगता है कि किसी भी सभ्य समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता ‘रचनात्मक आलोचना’ तक सीमित होनी चाहिए और विभिन्न सामाजिक परिकाष्ठाओ आदि के अपमान के लिए उपयोग नहीं की जानी चाहिए|

अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक इवेंट के लिए कॉल किया गया था| देश के विभिन्न हिस्से में ‘बोल न आंटी आऊ क्या’ नाम से एक इवेंट आयोजित की गई थी| जिसमें हजारों लोग शामिल हुए थे| तब समाज की तरफ से मुखालफत की स्वरें नहीं उठाई जा रही थी| मेरी नाराजगी उस गायक से कम उन लोगों से ज्यादा है जो उसमे शरीक हुए थे| आखिर कहीं से तो वो चीजें विकसित हो रही है जिससे एक नौजवान घर का आराम छोड़कर भरे बाज़ार में एक ‘फ़्लैश मॉब’ का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित होता है| ‘फ़्लैश मॉब’ गलत चीज नहीं है| गलत चीज उस मॉब का ड्राइव है| मुझे अच्छा लगता जब यही नौजवान एक कॉल गरीबी और बेरोजगारी के लिए करते| जो नौजवान इसमें शरीक होने गए थे, हो सकता है कि अगले दिन कोई भीड़ उसके घर के आगे ऐसी इवेंट आयोजित कराए| ऐसे में उसे बुरा नहीं मानना चाहिए| ऐसे इवेंट और इवेंट में शरीक होने वाले लोगों से पता चलता है कि आज भी हमारा समाज औरतों को किस पैमाने पर मापने की हैसियत रखता है|

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‘फ़्लैश मॉब’ एक गाने को चिल्लाने और गायक के लिए अपना समर्थन ज़ाहिर करने लिए कहता है, जिसमे वो खुलेआम अपने पड़ोस में रहने वाली आंटी के साथ सेक्स करने की बातें करता है| ‘सेक्स’ बुरी चीज नहीं होती यह एक बायोलॉजिकल प्रक्रिया है जो मानव जाती का इस संसार में स्वागत करता है| यह एक सार्थक प्रक्रिया है| लेकिन गलत वो है जो महिलाओं को ऐसे इवेंट के सहारे गलियां देने की कोशिश करते है| यह एक ऐसा गाना है जो औरतों को इस्तेमाल किए जानेवाले सामान की तरह दिखाता है| ज़बरदस्ती उनके साथ सेक्स को बढ़ावा देता है और इस सबके लिए औरत को ही ज़िम्मेदार बताकर सही ठहराता है| पुरुष प्रधान समाज का इससे बढ़िया उदहारण और हो ही क्या सकता है| जो भी गायक है वो पड़ोस की आंटी के साथ बहुत हिंसक तरीके से सेक्स करने के बारे में बख़ान करता है| ऐसे कामों के लिए बहुत आसानी से भीड़ इकठ्ठी हो जाती है|

औरतों पर नानाप्रकार के हिंसात्मक आचरण की कई खबरे अक्सर अख़बारों में आती ही रहती है| आखिर उसकी कहीं तो पाठशाला होगी? रेप, छेड़छाड़ की घटना आजकल आम हो चुकी है| NCRB(नेशनल क्राइम रिकॉर्ड और ब्यूरो) 2015 के अनुसार 95% रेप के केस वो होते है जिसमे रेप करने वाला विक्टिम को पहले से जान रहा होता है| जिसमे 27% रेप केस ऐसे होते है जो पड़ोस द्वारा किया जाता है| आखिर इसकी पाठशाला कहीं तो होगी? जिसको इंजिनियर बनना होता है वो बीटेक करता है, जिसको डॉक्टर बनना होता है वो MBBS या उससे सम्बंधित पढाई करता है, जिसको पत्रकार बनना होता है वो मास कम्युनिकेशन करता है| रेपिस्ट बनने के लिए कहाँ और किसकी पढाई होती है? इसकी प्राथमिक पाठशाला घर ही है| जहाँ पर लिंग के आधार पर भेदभाव होती है| पुरुष जाती को बचपन से वो बेपनाह अधिकार और छूट मिलती चली जाती है क्युकी उन्हें कभी अवरोधित किया ही नहीं गया| वही लडके बड़े होकर ऐसे इवेंट आयोजित करवाते है और इसके प्रैक्टिकल अनुभव पाते है, जो उन्हें ये सब करने के लिए उत्साहित करता है|

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दूसरी घटना, अभी हाल में BHU में हुई घटना कोई तात्कालिक और प्रायोजित थोड़ी न है| प्रायोजित, तात्कालिक, बदनाम करने के लिए करवाना, कड़ी करवाई होगी, निंदनीय घटना है, इस घटना से पूरा समाज आहात है, ये सारे शब्द राजनितिक शब्द है इनका व्यावहारिक जीवन में कोई सरोकार नहीं है| BHU में आन्दोलन हुआ और उसके बाद पुलिस कार्यवाई हुई, छात्राएं घायल हुई यह एक अलग मुद्दा है| यह मसला राजनीतीक दल और यूनिवर्सिटी के प्रशासन की खामियों से जुडी हुई है| लेकिन उससे पहले यह बात आती है कि ये घटना हुई कैसे? कौन लोग थे ये करने वाले? अक्सर टीवी डिबेट में विश्लेषण करने वाले इस बात की दुहाई देते रहे है कि ये छेडछाड, रेप आदि वही करते है जो गरीबी के निचले स्तर से आते है, जो अनपढ़ होते है| बनारस की हुई घटना समाज द्वारा बनाई गई उस मिथक को भी तोडती नजर आती है| इस घटना का दूसरा भाग घटना घट जाने के बाद हुई कार्यवाई और उसकी राजनीती से सम्बंधित है| यहाँ पर प्रशासन और यूनिवर्सिटी दोनों अपने अपने स्तर पर पूरी तरह से विफल रही है|

लेकिन जब बी.एच.यु. की छात्राओं ने हो रहे भेदभाव का इजहार किया, उनके साथ हो रही गन्दी हरकतों के खिलाफ अपनी आवाजें उठानी शुरू की, तब तमाम तरह की बातें की जाने लगी| सोशल मीडिया के आने के बाद से हमारा ‘ज्यादातर’ समाज दो धडों में बंट चूका है| पहला है जिसे सरकार के किसी भी काम में कोई बुराई नहीं दिखता और दूसरा जिसे सरकार से किसी भी काम में कोई अच्छाई नहीं दिखता| ऐसे घटनाओं में अपने कर्त्तव्य के प्रति असफल रहे यूनिवर्सिटी के प्रशासन को अपने पसंदीदा सरकार की नाकामी बुझने लगते है| इसके बाद जिसे वर्तमान की सरकार में कोई बुराइयां नहीं दिखती है वो अपना पक्ष लेकर आन्दोलन कर रही लडकियों और अपने प्रतिद्वंदी राजनितिक दल को निशाना बनना शुरू कर देता है जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है| फिर वही से बातें शुरू होती है ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘राष्ट्रवाद’| लड़कियों के असल मुद्दे बहुत पीछे छूट जाते है|

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यहाँ पर अगर ध्यान दिया जाए तो दोनों ही उदाहरणों में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के अपने अपने मायने है| पहला उदहारण देखा जिसमें एक नौजवान गंदे लब्जों के सहारे इवेंट आयोजित करके भीड़ इकठ्ठा करता है| यह एक वैसा ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ है जो नौजवान को गन्दी राह के लिए पोषित करता है| दुसरे उदाहरण में हमने BHU के घटना को देखा| इस घटना में लड़कियों के ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का एक अलग मायना है| वही लड़कियां जब अपनी प्रतिष्ठा और अधिकार के लिए प्रतिरोध की स्वरें उठाती है तो उनका पुरजोर विरोध होता है| अगर इन दोनों घटनाओं में देखा जाए तो दोनों में एक गहरा सम्बन्ध भी है जिसे हम अक्सर नजरंदाज कर देते है| कुल मिलाकार कहा जा सकता है कि उचित और रचनात्मक अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान नहीं हो पाता है वही दूसरी ओर गलत तरह से ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर फायदा उठाने वालों की मुखालफत भी नहीं हो पाती है|

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