ऐतिहासिक आदर और भावी रास्ता हेतु वर्तमान की समीक्षा जरूरी

यह बात बिल्कुल सही है कि जो देश, समाज और सबसे महतवपूर्ण जिससे देश या समाज बनता है, उस देश के लोग, वर्तमान की समीक्षा नहीं करते उसे इतिहास तो बिल्कुल आदर देता ही नहीं है बल्कि भविष्य भी रास्ता देने से इंकार कर देता है| आजादी के बाद से लेकर अब तक बहुत सारे प्रधानमत्री हुए और बहुत सारे लोग राष्ट्रपति हुए| लेकिन आज इतिहास में किन लोगों को लोग याद करते है? भगत सिंह, महात्मा गाँधी और जयप्रकाश जैसे लोगों को| ये लोग ना तो प्रधानमंत्री रहे और नाही राष्ट्रपति| फिर भी इनके विचार आज भी हमारे बीच जिन्दा है| इनको इतिहास ने खूब तवज्जों दी|

अक्सर होता क्या है कि हम पूर्वजों को अपनी नाकामियों के लिए कोसते रहते है| उनको इस बात के लिए आज भी घेरे में लिया जाता है कि उनके काल में भारत कैसे बंट गया? आज हम क्या कर रहे है? हमारा यूथ आज किस ओर रुख कर रहा है| भारत के यूथ जिसकी चर्चा पूरे विश्व में है कि आने वाले समय में ये विश्व का नेतृत्व कर सकते है, उनको राजनितिक नशा में लिप्त किया जा रहा है| पता है इसका क्या कारण है? इसका कारण वर्तमान में नहीं बल्कि इतिहास में भी छिपा है जिसका प्रतिबिम्ब हमें वर्तमान में दिखता है| इसी प्रतिबिम्ब को ही हम कारण मान लेने की भूल कर बैठते है|

पूरा विश्व पर फ़्रांस और ब्रिटेन ने राज किया| इन देशों को छोटे होने के बावजूद पूरे विश्व पर राज करने का मुख्य आधार क्या रहा है? इन्होने सभी देशों के नब्ज पकड़ रखा था, कि किस देश को कैसे तोडा जा सकता है और कैसे शासन किया जा सकता है| फ्रांसीसियों ने मिडिल ईस्ट के देशों में धर्म के अन्दर सेक्टोरिअल लाइन को आधार बनाया और शिया-सुन्नी को बाँट शासन करने में सफल रहे है| वही अंग्रेज भारत जैसे देश को धर्म का आधार बनाया और बाँटना शुरू किया और इसमें ये भी सफल हुए|

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भारत से जब अंग्रेजों का जाने का समय आया तो उन्हें यह बात समझ आई कि सिर्फ धर्म के नाम पर बांटने से कुछ विशेष नहीं होगा, कुछ और पैरामीटर पर भी बांटना बहुत जरूरी है| उन्हें एक एलिमेंट दिखा जाती| इसके लिए जातिगत आधार पर विकास का बहाना बनाकर पहली मर्तबा इसकी जनगणना करवाई| इस जनगणना की ख़ास बात यह थी कि इसमें दलितों को इस बात का एहसास दिलाया कि वो हाशिए पर बुरी तरह से ढकेले हुए है| इस तरह से जाती के अंदर भी खांचे बाटने में सफल हो गए|

फिर उन्हें इस बात का एहसास हुआ होगा कि ऐसे में उनका लक्ष्य मुकम्मल नहीं हो पाएगा| हिन्दू संख्या में बहुत ज्यादा है और मुस्लिम या फिर दलित बहुत कम है| समस्या तब पैदा होगी न जब दोनों दल टक्कर का होगा| आमने सामने करने के लिए मुस्लिम और दलित को थोडा पास लाने की जरूरत है| इसके लिए दलितों में हिन्दू धर्म के खिलाफ नफरत कूट-कूट कर भरनी होगा| डॉ भीम राव आंबेडकर के विचारों को इसका माध्यम बनाया गया| उनकी असहमतियों को अंतिम सत्य मानकर दलित वर्ग को हिन्दू धर्म से अलग करने का अथक प्रयास किया गया|

इस तथाकथित सामाजिक अस्तित्व के जोड़-तोड़ के में ब्राम्हणों का भी अच्छा ख़ासा योगदान रहा है| बौध धर्म के अहिंसक उद्गम से ब्राम्हणों को इस बात की चिंता सता रही थी लोग उस विचार से प्रभावित होकर उधर रुख कर सकते है| इस बौध बनाम ब्राम्हण की आमने सामने की लड़ाई में ब्राम्हणों ने भी अहिंसा को बल दिया और जानवरों की हत्या और उनका मांस खाने पर अनिक्छुक हुए| फिर इन लोगों ने जानवर के मांस न खाने वालों का एक समूह बनाया और खाने वाले को दलित या अछूत की उपाधि दे दी गई| तब से इसका क्लैश शुरू हुआ|

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आज के भारत में इसका प्रतिबिम्ब तब दिखता है जब ओवैसी की धार्मिक ध्रुवित पार्टी ‘जय भीम जय मीम” का नारा देता राजनीती में दिखाई पड़ता है| वैसे तो इन्हें ‘जय’ शब्द का उपयोग करना गैर इस्लामिक लगता है, लेकिन जब बात सत्ता की आती है तो नारों में इसका खूब उपयोग किया जाता रहा है| बैकग्राउंड में भीम राव आंबेडकर के असहमतियों को लिया विश्वास में लिया ही जाता है|

फिर से लौट कर अंग्रेजों पर आते है| जाते-जाते अंग्रेजों ने भाषा को भी आधार के रूप में अख्तियार करने की कोशिश| अस्मिता को केंद्र रखवाया और दक्षिण भारत तथा गुजरात और महाराष्ट्र में इसका बीज बोया| कहने का मतलब यह है कि कोई भी फैक्टर नहीं छोड़ा| जितना हो सकता उतने स्तर पर बांटने की कोशिश की| इसका परिणाम यह हुआ कि लोग जिससे भारत बनता है, जिसके बारे में जवाहर लाल नेहरु ने अपनी किताब “भारत की खोज” में इनकी जय का नारा लगाया, ये लोग कई स्तर पर आज बंट चुके है| सबसे पहले गाँव में टोला के हिसाब से बंटता है, फिर वहाँ से जब निकलता है तो गाँव के अस्मिता को केंद्र में रखकर बंटना शुरू करता है|

फिर क्षेत्र जिला से होते हुए राज्य पर बटते चला जाता है| ये असामी है, वो बिहारी है, ये तमिल है वो हरियाणवी है, ये पंजाबी है और वो मराठी है| सभी स्तरों पर प्रतिद्वंदी के तौर पर देखा जाता है, कहीं भी सामाजिक सौहार्दय बढ़ाने और साथ चलने के रूप नहीं दिखता है| जब गाँव और समाज में होता है तो जातिगत चीजें हावी होती है| उच्च जाती और दलितों का बटवारा होता तो है ही उसमे भी अलग अलग खांचे बटें हुए है| बाद में चलकर तथाकथित उसकी प्रतिष्ठा बन जाती है|

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इतने स्तर पर बंटने के बाद देश अपनी ताकत और सामर्थ्य को पहचानने लायक बच ही कहाँ जाता है? क्युकी हमारे समाज में भय से शासन करने की मिजाज जो बन बैठा है| एक तबका इस बात के लिए डराता है कि कहीं उसकी संख्या हमसे ज्यादा न हो जाए| यही मुख्य कारण है कि कश्मीर में वहाबीकरण का प्रतिबिम्ब दिखने लगा है| जहाँ दो चार लफंगे सशस्त्र सेना बन को थप्पड़ मारते, लात मारते या फिर हेलमेट छिनते नजर आते है|

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