हिमालय घाटी में भारत-चीन तनाव और संभावित रास्ते

हू जिंताओ जब चाइना के कम्युनिस्ट पार्टी के ‘सेक्रेटरी जनरल’ थे तब उन्होंने अपनी ‘Peaceful Rise‘ जाहिर की थी ताकी चाइना को पश्चिम से किसी भी प्रकार का दबाव न झेलना पड़े| कुछ चीजें प्राकृतिक सत्य होती है| उनमे से एक सत्य यह है की कम्युनिस्ट का उदय कभी भी शांतिपूर्ण नहीं हो सकता है| अगर कोई इस बात से इनकार करता है तो यकीन मानिए वो या तो कम्युनिस्ट है या फिर वो अनजान है| कोई भी देश महज अग्रीमेंट करके बैठ जाए और अपेक्षा करे कि सामने वाला देश ईमानदारी से उसका पालन करेगा तो मुझे लगता है कि इससे बड़ी मुर्खता कुछ और नहीं हो सकता|

यह प्राकृतिक सत्य है की बारिश अपने समय पर दस्तक देगा| अब आप पर निर्भर करता है की आप बारिश का जवाब जैसे देते है – रेन कोट पहनिए या छाता का उपयोग कीजिये यह विकल्प सबके लिए अलग हो सकता है| शायद यही कारण है की अमर्त्य सेन “अकाल” के पीछे भोजन की कमी को कम और वितरण में असमानता को ज्यादा दोष देते है|

चाइना हमारे देश से बॉर्डर साझा करता है| इस बात की अपेक्षा हमें करके बैठनी चाहिए कि गुलाबों के बौछार सीमा पर नहीं होंगे| ऊपर से अगर पडोसी मुल्क की विचारधारा कम्युनिस्ट या इस्लामिक है तो बात पक्की हो जाती है कि सरहद की रेखा खून से खीची जा सकती है| आए दिन हिंसा होना कोई चमत्कार नहीं होगा| कम्युनिस्ट देशों और इस्लामिक देशों में कोई ख़ास अंतर नहीं है सिवाय इसके कि एक भगवान को मानता है और एक नहीं मानता| दुसरे शब्दों में “कम्युनिस्ट इज इस्लामिस्ट वीदाउट गॉड”| बाद बाकी चाल चलन और हिंसात्मक व्यवहार सब एक जैसा ही होता है|

दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत के पास दोनों किस्म के पडोसी मुल्क है| दोनों को झेलने के लिए बहुत साहस और जनता के बीच एकता की जरूरत होती है| आप खुद सोचिये अमेरिका को क्या चिंता है? एक तरफ प्रशांत महासागर है और दूसरी तरफ अटलांटिक| ऊपर एक देश कनाडा है जो उसके राज्य जैसा व्यवहार करता है| इसलिए हिंदुस्तान जिस साहस से दोनों फ्रंट पर मुकाबला कर रहा है और कोई आम बात नहीं है|

सवाल यह है की चाइना यह सब और इस अकाल के बीच क्यों कर रहा है? इसके पीछे कई कारण है| हर जानकार अपने अपने हिसाब से जिसका दावा कर रहे है| जे.एन.यु. के प्रोफेसर और जानकार हैप्पीमन जैकब दावा कर रहे है कि आर्टिकल 370 का हटना एक मुख्य कारण है| इसके पीछे वो तर्क देते है की यह मुद्दा पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए साझा है| दूसरा तर्क यह देते है कि विदेश मंत्री 370 हटने के बाद चाइना का दौरा करते है और वादा करके आते है कि LAC पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा| वही जब गृह मंत्री का भाषण विदेश मंत्री के वादा के विपरीत जाना चाइना को एक तरह से उकसाता है|

मुझे लगता है की यह तर्क खोखला है क्युकी ऐसा नही है कि 5 अगस्त 2019 के पहले चाइना सामान्य था| चाइना ने J&K के लोगों के लिए पासपोर्ट भी जारी किया है उसके पहले और बॉर्डर पर आना-जाना लगाए रखा है| दूसरी बात साउथ चाइना समुद्र में बाकी के देशों ने कौन का कुछ ऐसी तबदीली की है? ऑस्ट्रेलिया तो इतना दूर है उसका ना तो सीमा से कोई सम्बन्ध है और नाही कोई ऐसी तबदीली की है| फिर ऑस्ट्रेलिया से चीन जो दिक्कत क्यों?

असल में जो दावा पूर्व सुरक्षा सलाहकार, नारायनन, जी दावा करते है कि चाइना में विपक्ष मजबूत हो रहा है| यह एक स्वीकार्य करने वाला तर्क है| मजबूत होते विपक्ष की बातों को दरकिनार करने के लिए और जिंगपिंग की प्रभुत्व को सदा जीवन बरक़रार रखने के लिए अपने सारे पड़ोसियों का दरवाजा खटखटा के ‘हाइपर नेशनलिस्ट’ बनने का ढोंग कर रहा है| कम्युनिस्ट भी नेशनलिस्ट होते है यह भी ताज्जुब की बात है| ऊपर से जब पूरा विश्व चाइना को ‘करोना वायरस’ पर घेर रहा है तब चीन के अन्दर से भी मुखालफत की आवाजें आ रही है|

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चाइना की गिरती इकनोमिक ग्रोथ से जिंगपिंग के ‘चाइनीज ड्रीम – 2050’ को कहीं न कहीं धक्का लगता दिख रहा है| ये बातें वहाँ की जनता हजम करने के लिए राजी नहीं हो रही है| इसके अलावां चाइना के सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए, 2016 में, 13वां प्लान लाया गया था| जिसमे बॉर्डर के आस पास रोड बनाने का दावा किया था| चाइना का करैक्टर लिक्विड (Liquid) वाला है| फैलने की आदत ज्यादा है| इसलिए पडोसी मुल्कों को इस बात का बखूबी ध्यान रखना होगा कि सीमा पर किसी भी प्रकार का छेद न हो| नहीं तो कब घुस आएगा पता लगाना मुश्किल हो जाएगा|

इसके अलावां जो मुख्य कारण है भारत सरकार के तरफ से लिए गए सख्त निर्णय| इसके पीछे भी एक भूमिका है| वर्तमान की मोदी सरकार ने शुरू में वही गलती किया जो अटल बिहारी वाजपेयी जी ने की थी| हालाँकि ‘गलती’ कहना भी गलत होगा क्युकी वो उनका एक्सपेरिमेंट था जिसमें सफलता हाथ नहीं आई| अटल जी ने दिल्ली-लाहौर बस डिप्लोमेसी के तहत भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को दुरुस्त करने की कोशिश किया था| यह उम्मीद की थी कि ‘दोस्त बदला जा सकता है लेकिन पडोसी नहीं’|

लेकिन एक प्राकृतिक सत्य कौटिल्या ने भी जाहिर की थी कि पड़ोसी देशों से मित्रता की अपेक्षा करना भी बेईमानी है| ठीक अटल जी की तरह भारत के वर्तमान प्रधानमंती नरेन्द्र मोदी ने वही गलती चाइना के साथ दोहराई| इस बात की पुष्टि ‘ब्रम्हा चेलानी’ के लेख “India’s Appeasement Policy Toward China Unravels” से मिलता है| शायद प्रधानमत्री जी ने पुरानी बातों से दूर होकर एक नए संबंध स्थापित करना चाह रहे हो| भारत ने ‘चिंतित देशों की सूचि’ से चाइना का नाम बाहर किया| दलाई लामा वाले स्टैंड से दूर होते दिखे| ‘चुनार’ में चाइना की मौजूदगी को अनदेखा किया|

मुझे लगता है कि शायद इतना प्रयास करने के बाद भी चाइना के रवैया में अन्तर नहीं आना, भारत को सोचने पर मजबूर किया| भारत ने चाइना को हर मुद्दे पर चुप्पी की बजाए जवाब दिया| ये चीज शायद चाइना को अच्छी नहीं लगी होगी| पहला, 2018 में भारत ने CPEC पर अपना विरोध जताया जो POK से होकर गुजर रही है| तब से भारत को एक नकारात्मक देश के रूप में चाइना में प्रदर्शित किया गया| वो बात अलग है कि जिंगपिंग ने भारतीय प्रधानमंत्री का किशोर कुमार के गाने (” तू है वही दिल ने जिसे अपना कहा…”) से स्वागत किया था|

दूसरा, इकनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट ने दावा किया की भारत ने 75% बॉर्डर रोड को बनाके पक्का कर दिया| यह चाइना को कैसे हजम हो सकता है| उसके सुरक्षा के नजरिये से कोई ठीक बात थोड़े है| तीसरा, पिछले साल भारत ने अरुणाचल प्रदेश और असम में ‘ऑपरेशन हिम विजय’ लांच किया था| इसका उद्देश्य था कि माउंटेन वारफेयर के लिए भारतीए फ़ौज को तैयार किया जाए जिससे समय आने पर चीन से मुकाबला किया जा सके|

चौथा, भारत ने RCEP से अपने आप को अलग रखा| यह संदेह लगाया जा रहा था की भारतीय किसानों को इससे नुकसान हो सकता है| क्युकी चाइना पूर्व के देशों के माध्यम से डेरी और बाक़ी के किसानों के प्रोडक्ट्स का नुकसान कर सकता है ठीक वैसे ही जैसे छोटे उद्योगों को भारत में सीधे निवेश से चौपट किया| पांचवा, भारत ने अपना FDI पालिसी बदला और आटोमेटिक रूट की जगह ‘आदेश’ लेने की व्यवस्था की| यह भी चाइना के हक़ में नहीं है क्युकी इससे चाइना की कंपनियों पर इसका सीधा असर दिख सकता है| छठवां, भारत के दो सांसद ने ताइवान से राष्ट्रपति के शपथ समारोह में हिस्सा लिए|

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इसमें ख़ास बात यह थी कि ना तो भारत के प्रधानमंत्री ने कोई ट्वीट करके बधाई दी और नाही विदेश मंत्री ने| यह चाइना के लिए एक साइलेंट और आक्रामक सन्देश’ था| सातवाँ, भारत और अमेरिका के बीच बढती नजदीकियां – चाहे बात “क्वाड ग्रुप” की हो या ट्रम्प के G7 में शामिल होने वाले निमंत्रण स्वीकारने की| चाइना को यह बात तो बिलकुल भी नहीं अच्छी लगेगी| आठवाँ, भारत और ऑस्ट्रेलिया ने हिन्द महासागर में बातचीत से अपनी साख को और मजबूत किया है| ये चाइना के लिए हिन्द महासागर में सीधा चुनौती है|

इसके अलावां चाइना ‘चालाक’ भी थोड़ा ज्यादा है| भले कम्युनिस्ट देश है ना तो उसकी अर्थव्यवस्था कम्युनिस्ट वाली है और नाहीं उसका विज़न| शीत युद्ध के समय कम्युनिस्ट देश (रूस) को भला बुरा कहा और खूब कोसा ताकी अमेरिका को लुभा सके| 1962 में भारत के साथ लड़ाई करने को राजी हुआ क्युकी मुख्य शक्तियां ‘क्यूबा’ में व्यस्त थी| भारत-पाकिस्तान के किसी भी युद्ध में पाकिस्तान का कभी साथ नहीं दिया| इसलिए चाइना की पालिसी “hide your capacity and bide your time” कोई ढकी छुपी नहीं है|

COVID-19 को एक अच्छे मौके के तौर पर भुनाने की कोशिश की| यूरोप कोरोना से बेहाल है| आपस में एकजुटता थी वो टूटती दिखी| उसमें भी चाइना की एक अहम भूमिका  है| अमेरिका अपने चुनाव में व्यस्त है| भारत की अर्थव्यस्था उम्मीद के मुताबिक दुरुस्त नहीं दिख रही है| साथ ही CAA और NRC के राजनीतिकरण ने देश की जनता को सामाजिक स्तर पर बाँट दिया है| देश की जनता में कहीं न कहीं एकजुटता की कमी भी दिख रही है| पड़ोसी देशों में स्तिथि हमारी बहुत अच्छी नहीं है| नेपाल का आक्रामक रवैया, श्रीलंका का न्यूट्रल होना, CAA पर बांग्लादेश की नाराजगी आदि ने पड़ोस भी कमजोर किया|

चाइना पर आंतरिक और बाहरी दबाव, भारत का आक्रामक जवाब और COVID-19 के कारण उर्वरक समय आदि, ये सब कारण है जिससे कि चाइना बेचैन दिख रहा है| अब सवाल यह उठता है कि भारत का रोडमैप आगे का कैसा होना चाहिए| इस क्षेत्र में भारत के जो विचारक है उनके मत बटें हुए है| कुछ लोग यह दावा कर रहे है कि यह समय है कि चाइना को बैलेंस करने के लिए अमेरिका का सहारा लेना चाहिए| इस खेमें का तर्क यह है कि अगर हमनें अमेरिका के करीब बन रहे रिश्तों से अपने आप को मोड़ लिए तो वही होगा जो असल में चाइना चाहता है|

चाइना अपने आक्रामकता से भारत को संकेत देना चाहता है कि अमेरिका के करीब जाना उसके हीत में नहीं है| एस खेमे का दूसरा तर्क यह है कि भारत का जहाँ इंटरेस्ट होगा वहाँ भारत को जाना चाहिए| कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भारत को ऐसी चीजों से बचना चाहिए| खासकर पाकिस्तान के साथ हुए घटना से भारत को सीख लेना चाहिए| भारत को अपने कुव्वत को, और मजबूत करना चाहिए जिससे अपने भविष्य को सुरक्षित कर सके| अमेरिका भारत से कोसों दूर बैठा है फ्रंट लाइन पर भारत और इसकी सेना है| आखिरकार मुक़ाबला भारत की सेना हो ही करना है|

मुझे भी ऐसा लगता है कि दुसरे पक्ष की बातें ज्यादा मजबूत है| अमेरिका ने दुनियां में कहीं भी अपना काम पूरा नहीं किया है चाहे वियतनाम हो, अफ़ग़ानिस्तान हो या फिर सीरिया| इसलिए अमेरिका को हर कदम पर सन्देश की नज़र से देखा जाना चाहिए| चाइना को दुनिया की बड़ी शक्ति बनाने के पीछे अमेरिका का भी बड़ा हाथ रहा है| 1972 में रिचर्ड निक्सन ने कम्युनिस्ट पार्टी वाली चाइना को अंतराष्ट्रीय पहचान दिया था| 1978 में जिम्मी कार्टर ने ताईवान से अपने राजनयिक रिश्ते ख़तम किए थे| 1989 में चीन के “थियानमेन चौक की घटना” को जार्ज डब्लू बुश ने अनदेखा किया था|

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अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने वैश्वीकरण के समय चाइना पर कोई लगाम नहीं लगाया| हद तो तब हो गई जब यह पता चला कि डोनाल्ड ट्रम्प चाइना से चुनाव के लिए मदद मांग रहे थे| ट्रम्प ने चाइना में हो रहे ‘उइघुर मुस्लिम’ के खिलाफ प्रताड़ना को पीछे से चाइना का समर्थन दिया था| ये बातें “जॉन बोल्टन” की नई पुस्तक जो थोड़े ही दिन पहले ही रिलीज़ हुई, उसने डोनाल्ड ट्रम्प का खुलासा किया| “जॉन बोल्टन” ट्रम्प सरकार में राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार थे| अगर उनके बातों में सच्चाई है तो अमेरिका को हर कदम पर शक के नज़र से देखना जायज है|

इसलिए अमेरिका पुरे विश्व में सबसे ज्यादा ‘अविश्वासी देश’ है| जैसा की एक्सपर्ट सुझाव दे रहे है कि बेहतर यह होगा कि भारत सबसे पहले अपने आर्थिक स्तिथि को सुधारे और उसे मिलिट्री ताकत में तब्दील करे| ऐसा इसलिए क्युकी ‘बहादुरी’ और ‘बेवकूफी’ में बहूत बारीक अंतर होता है| भारत ने जो जवाबी और आक्रामक रुख लिया हुआ है उसे बिना मिलिट्री इंगेजमेंट के साथ बरक़रार रखना चाहिए| चाइना को इस बात से बिलकुल साफ़ करा देना चाहिए कि हिंदुस्तान की कुछ मूल बातें है जिसपर वो किसी भी शर्त पर समझौता नहीं कर सकता – जैसे कि भारत की संप्रभुता और इसका सीमा|

चाइना को इस बात से भी साफ़ कर देना चाहिए की ‘अगर हिलामय की क्षेत्रो में कुछ भी करोगे तो हम लोग दक्षिण चीन के समुद्र में हम भी किशोर कुमार के गाने “तू है वही दिल ने जिसे अपना कहा…” को बजाएँगे और कुछ-कुछ करेंगें| अगर आप कश्मीर में थोड़ा भी दख़ल दोगे पाकिस्तानी म्यूजिक के साथ तो हम भी ‘होंगकोंग’ और ‘ताइवान’ में हिंदी गाने बजाएंगे| लेकिन शर्त यह है कि ये सब अपने बूते पर हो और अमेरिका की कोई ख़ास भूमिका नहीं होनी चाहिए| ये सब संभव है| बाद बाकी आगे क्या होगा यह भविष्य के गर्भ में है|

Footnotes

  1. Decoding Dream India | The China’s so called “peaceful rise” and a new engagement in geopolitics
  2. Foreign Affairs | China’s “Peaceful Rise” to Great-Power Status
  3. The Economic Times | Chinese aggression in South China Sea & East China Sea face strong pushback
  4. The Hindu | A chill in U.S.-China relations
  5. The Hindu | China, Kashmir and the ghost of August 5
  6. The Hindu | Remaining non-aligned is good advice
  7. Project Syndicate | India’s Appeasement Policy Toward China Unravels
  8. The Economic Times | In ramp-up, 75% roads on China border ready
  9. Financial Express | When China played Rishi Kapoor’s ‘Tu hai wahi’ to welcome PM Narendra Modi
  10. The Print | Army to debut its Mountain Strike Corps next month, at HimVijay exercise in Arunachal
  11. The Economic Times | India notifies FDI policy change mandating prior nod for border-sharing nations
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